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कार्य क्षेत्र और व्यक्तिगत जीवन के बीच अंतर होता है
अमूमन हम लोग किसी इंसान की पहचान उसके कार्य से करते हैं . लेकिन यह कार्य भी अनेक आयाम लिए हुए है. यह कार्यक्षेत्र यदि प्रोफेशनल हो तो मामला गंभीर हो उठता है. जैसे एक सैनिक का कर्तव्य सीमा पर रक्षा करते हुए युद्ध के दौरान दुश्मन देश के सैनिक को मार गिराना ही होता है. वैसे ही किसी पुलिस वाले, किसी आई पी एस किसी अंगरक्षक का कार्य असामाजिक तत्वों से समाज की रक्षा करना ही है. अंगरक्षक भले ही यह जनता हो कि जिसकी रक्षा में उसे तैनात किया गया है उसे तो जेल में होना चाहिए लेकिन नहीं , अपनी सेवा के दायित्व के अंतर्गत उसे उस व्यक्ति की रक्षा करनी होती है. कई बार आप पायेंगे कैदियों को भी सुरक्षा प्रदान की जाती है भले ही उन पर हत्या का मुकदमा चल रहा हो.
इसे थोड़ा गंभीरता से देखते हैं, हम सभी फ़िल्म देखते हैं और जेलर शब्द आते ही सत्येंद कप्पू , इफ़्तिख़ार और असरानी का चेहरा हमारे सामने होता है. वैसे ही एक कलाकार थे संजीव कुमार जो शोले में ठाकुर से पहले जेलर थे. मैं संजीव कुमार को कोट करना चाहूँगा, उन्होंने हजारों फ़िल्म में विभिन्न किरदार निभाये हैं और उनके द्वारा निभाया गया कोई भी चरित्र आप देखेंगे तो वह आपको सजीव लगेगा. वे जेलर की भूमिका में हैं तो जेलर, ठाकुर की भूमिका में हैं तो ठाकुर और पिता की भूमिका में हैं तो पिता हैं . अमिताभ बच्चन की बात करें तो उन्होंने ने अनगिनत भूमिकाएं निभाई हैं लेकिन कोई भी भूमिका उनके वास्तविक चरित्र को नहीं दर्शाती है. एक खलनायक हुए हैं प्राण लेकिन उनका चरित्र बड़े बड़े नायकों के चरित्र को पीछे छोड़ देता है. सवाल यह कि जो व्यक्ति पर्दे पर दिखाई देता है क्या वास्तव में वह वही है. इस आप कार्य के रूप में देखिए, अपनी कुर्सी पर बैठा एक पुलिस वाला , एक आई पी एस अधिकारी , एक कंपनी का सी ई ओ क्या मात्र वही है जो वह अपनी सीट पर बैठ कर काम कर रहा है और देखने वालों को नजर आ रहा है. इसका उत्तर है नहीं, इंसान जो अपने कार्य अपने प्रोफेशन से नजर आता है और वह वास्तव में अपने भीतर जो है उसमें बहुत फर्क है. यह दूसरी बात है कि हमारे वास्तविक व्यक्तित्व का प्रभाव हमारे कार्य क्षेत्र पर और हमारे कार्य क्षेत्र का प्रभाव हमारे व्यक्तिगत जीवन पर पड़ता है.
व्यक्तिगत जीवन और कार्य क्षेत्र के बीच जो विभाजन रेखा है उसे देख पाना अत्यंत कठिन कार्य है. इस से भी बड़ा काम है अपने व्यक्तिगत जीवन में ख़ुद को इस कार्य क्षेत्र के प्रभाव से मुक्त रखते हुए अपनी मौलिकता और नैसर्गिकता को बचाए रखना. इसका एक बहुत बड़ा सटीक उदाहरण हैं भूतपूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी . वे प्रधानमंत्री होते हुए भी व्यक्तिगत जीवन के अपने कवि को जीवित रखते हुए अपने जीवन के आयाम को संपूर्णता देते हैं .
अब बात एक जेलर के पन्ने की, अरुण सिंह एक जेलर रहे हैं , एक वास्तविक जेलर फ़िल्मी जेलर नहीं और ऐसे जेलर जिनकी जेल में मुख्तार अंसारी जैसे वी आई पी कैदी भी रहे हैं.
यहाँ मुझे न्यायालय के एक एंगल को देखना होगा. न्यायालय अर्थात् न्यायाधीश हमेशा यह कहते हैं कि किसी भी अपराधी के लिए जेल एक अंतिम विकल्प है. अर्थात जब किसी भी असामाजिक व्यक्ति को किसी भी अन्य तरीके से न सुधारा जा सके तब सजा और जेल का प्रावधान होना चाहिये. यह जेल को ले कर एक अलग नजरिया प्रस्तुत करता है अर्थात् जेल का अर्थ कैदी को बांध कर या सींखचों में बंद कर रखना नहीं है बल्कि उसे समाज के नियमों के अनुरूप उसके भीतर वैचारिक परिवर्तन ला कर उसे समाज की मुख्य धारा में जीने योग्य बनाना है . किंतु दुर्भाग्य से हमारे देश में जेल , कैदी और जेलर को ले कर एक अत्यंत ही कठोर और ऋणात्मक छवि है.
मैं आज से छ: सात साल पहले जब अरुण सिंह के संपर्क में आया तो मेरी यह छवि ध्वस्त हुई , मैं अरुण सिंह को एक पुलिसिया जेलर में रूप में देखने और उस रूप में उससे मिलने की उम्मीद कर रहा था लेकिन जब मैंने अरुण की कवितायें देखीं तो अचानक मेरे भीतर यह लाइन उभरी कि अरुण कार्य क्षेत्र, सामाजिक परिस्थितियों और समाज के एक सामान्य दृष्टिकोण के बीच अपने व्यक्तिगत जीवन के माध्यम से फ़र्क़ कर पाने में सफल हुए हैं . वे अपनी इन कविताओं के माध्यम से व्यक्तिगत जीवन और कार्य क्षेत्र के बीच विभाजन रेखा खींचते हैं .
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