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“भ्रम से बोध की ओर” केवल एक किताब नहीं, बल्कि स्वयं से संवाद की एक यात्रा है।
यह पुस्तक उन धारणाओं, विश्वासों और निष्कर्षों पर प्रश्न उठाती है जिन्हें हम बिना जाँचे जीवन का सत्य मान लेते हैं।
यहाँ “मैं” कोई लेखक नहीं, बल्कि हर वह पाठक है जो अपने भीतर झाँकने का साहस करता है।
किताब सही–गलत, ज्ञान–अज्ञान, सत्य–असत्य जैसे विषयों को किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि प्रश्नों और अनुभवों के माध्यम से खोलती है।
इसमें दर्शन है, पर जटिलता नहीं।
आध्यात्म है, पर पाखंड नहीं।
कविता है, पर कल्पना नहीं—यह अनुभव की भाषा है।
यदि आप उत्तर नहीं, बल्कि सही प्रश्न खोज रहे हैं—
यदि आप भीड़ से नहीं, बोध से चलना चाहते हैं—
तो यह पुस्तक आपके लिए है।
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