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यह कहानी एक माँ के उस इंतज़ार की है, जो उम्मीद के सहारे ज़िंदगी जीती रही।
पति को खोने के बाद उसने अपने बेटे में ही अपना पूरा संसार देख लिया।
उसने त्याग किया, सहा, और हर दर्द को मुस्कान में छुपा लिया…
लेकिन वक्त बदलता है, रिश्ते बदलते हैं, और कभी-कभी अपनों की दूरी सबसे गहरा घाव बन जाती है।
अपना घर छिन जाने से लेकर वृद्धाश्रम की खामोश रातों तक,
उसकी आँखें बस एक दरवाज़े पर टिकी रहीं…
ये कहानी प्यार, उपेक्षा, पछतावे और देर से आई समझ की है।
एक ऐसी माँ की, जो आख़िरी साँस तक अपने बेटे से नाराज़ नहीं हुई,
बस इंतज़ार करती रही।
ये सिर्फ एक कहानी नहीं…
ये आईना है, जो रिश्तों की सच्चाई दिखाता है।
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