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पिंजरा खुला है, फिर भी आप कैद क्यों हैं ?
हम सब सुख की तलाश में हैं, लेकिन हाथ लगती है—चिंता, तनाव और कभी न खत्म होने वाली दौड़। बाहर से हम स्वतंत्र दिखते हैं, लेकिन भीतर हम अपने ही विचारों, पुरानी आदतों और 'मानसिक गुलामी' की अदृश्य जंजीरों में जकड़े हुए हैं।
'प्रमुक्ति' (Pramukti) केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि चेतना के रूपांतरण का एक विज्ञान है।
लेखक प्रमुक्त, जो एक मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक हैं, इस कृति में प्राचीन अध्यात्म और आधुनिक मनोविज्ञान के सूत्रों को एक साथ पिरोते हैं। यह पुस्तक आपको 'कर्म और मन के विज्ञान' को समझाते हुए, उन सात द्वारों (7 Portals) से ले जाती है, जहाँ आप सीखेंगे:
सत्य-दर्शन: अपने असली स्वरूप (चेतना) को पहचानना।
समत्व योग: जीवन के उतार-चढ़ाव में अचल रहने की कला।
साक्षी भाव: विचारों और भावनाओं के बवंडर से बाहर निकलने की विधि।
यह पुस्तक आपको 'दिलासा' देने के लिए नहीं, बल्कि आपको 'जगा' कर आपकी खोई हुई संप्रभुता लौटाने के लिए लिखी गई है।
मुक्ति भविष्य में नहीं, अभी है। क्या आप अपनी परम स्वतंत्रता की उड़ान भरने के लिए तैयार हैं?.. अपनी यात्रा आज ही शुरू करें!
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