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जबकि घोड़ा बेशक चाहे तांगे में जुतने लगा हो. हालांकि तांगे भी अब कहाँ रहे. अब तो ज़्यादा से ज़्यादा उसे दूल्हे की बग्गी में जुत कर ही गुज़ारा करना पड़ता है. फिर भी जब राजनीति में घोड़ों की मंडी लगती है. तो खरीद-फरोख्त करोड़ों में ही होती है. यह नजारा देखकर किसी ज़माने के अरबी और काठियावाड़ी घोड़ों की आत्माएँ भी तड़प उठती होंगी कि हाय हम आज के नेता क्यों न हुए. राजनीति के बाद इस पुस्तक के लेखक ने ही घोड़ों के साथ सचमुच न्याय किया है. अलबत्ता अगर ज़माने की बात करें तो ज़माना एक बार फिर माचो मैन का ही है और माचो मैन तथा स्टड में ज़्यादा फ़र्क़ कहाँ होता है.
पता नहीं मुरलीजी ने अपने इस संग्रह में इक्हत्तर व्यंग्य क्यों रखे? या तो इक्यावन रखते या एक सौ एक रखते. भई इक्हत्तर का प्रसाद कौन बांटता है. लेकिन दोष उनका भी नहीं. इधर उनकी पदोन्नति हो गयी है और वे व्यंग्यकार से ज़्यादा कवि हो गए हैं. साहित्य की वर्णव्यवस्था में अब वे सवर्ण हो गए हैं. आदमी अवर्ण होने की पीड़ा आख़िर कितनी सहेगा! कभी हमारी जमात एक थी. इसलिए उम्मीद करूंगा कि वे भाईचारा निभाते रहेंगे और अगली बार कम से कम एक सौ एक का प्रसाद तो अवश्य ही बांटेंगे!
अग्रिम शुभकामनाएँ!
दिनांक: 17 सितंबर 2020 सहीराम
(प्रसिद्ध व्यंग्यकार)
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