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हम ज़्यादातर सही फैसले क्यों नहीं लेते?
हम बार-बार वही गलतियाँ क्यों दोहराते हैं?
हम जानते हुए भी खुद को नुकसान क्यों पहुँचा देते हैं?
माइंडफ्रेम इन सवालों का जवाब प्रेरणा या उपदेश से नहीं, बल्कि मानव मन के भीतर चल रहे ऑपरेटिंग सिस्टम को समझाकर देता है।
यह किताब मनोविज्ञान की पाठ्यपुस्तक नहीं है।
यह एक स्पष्ट, मानवीय और व्यावहारिक गाइड है जो दिखाती है कि:
आपका दिमाग फैसले कैसे लेता है
भावनाएँ तर्क पर कैसे हावी हो जाती हैं
मन के पूर्वाग्रह आपको कैसे गुमराह करते हैं?
याददाश्त सच को कैसे बदल देती है
रिश्तों, पैसों और पहचान में गलतियाँ क्यों होती हैं
आप ऑटोपायलट मोड पर क्यों जीने लगते हैं
सरल भाषा और बातचीत जैसे अध्यायों के ज़रिये, यह किताब उन छिपे हुए मानसिक पैटर्न्स को उजागर करती है जो चुपचाप आपके व्यवहार को नियंत्रित करते रहते हैं।
यह किताब आपको “बेहतर इंसान” बनने का दावा नहीं करती —
यह आपको ज़्यादा जागरूक इंसान बनाती है।
क्योंकि जब आप अपने मन के सिस्टम को समझ लेते हैं,
तो जीवन अपने-आप ज़्यादा स्पष्ट, संतुलित और सचेत हो जाता है।
अगर आपने कभी खुद से पूछा है —
“मैं ऐसा क्यों करता हूँ?”
तो यह किताब उसी सवाल का जवाब है।
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