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भगोड़े का सिंहासन किसी पारंपरिक अर्थ में “कहानी-संग्रह” नहीं है, बल्कि एक दार्शनिक-आख्यानात्मक परियोजना है, जहाँ कथा, निबंध, रूपक, मिथक, सामाजिक व्यंग्य और आत्मालोचनात्मक गद्य—सब एक ही प्रवाह में बहते हैं। यह संग्रह समाधान प्रस्तुत करने के बजाय प्रश्नों के साथ ठहरने का अभ्यास है। इसकी केन्द्रीय चिंता मनुष्य का पलायन है—जीवन से नहीं, बल्कि जीवन की स्थिर व्याख्याओं से।
यह पुस्तक उस साहित्यिक परंपरा में आती है जहाँ कथा साधन है, लक्ष्य नहीं। यहाँ पात्र, घटनाएँ और संवाद अक्सर किसी दार्शनिक बिंदु को उद्घाटित करने के लिए उपस्थित होते हैं—और कई बार कथा स्वयं पीछे छूट जाती है, जबकि विचार आगे बढ़ जाता है। यह चुनाव जानबूझकर किया गया है और इसे कमजोरी नहीं, बल्कि परियोजना का स्वभाव समझना चाहिए।
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