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यह पुस्तक किसी रोग का इलाज नहीं, बल्कि एक जागरण है—यह समझने का प्रयास कि चिंता आती क्यों है, टिकती क्यों है और उसे बिना संघर्ष के कैसे छोड़ा जा सकता है।
"मस्त रहो, स्वस्थ रहो" कोई नारा नहीं, बल्कि एक जीवन-दृष्टि है—जहाँ मन हल्का हो तो शरीर भी साथ देता है। यह पुस्तक उपदेश नहीं देती, बल्कि एक अनुभवी साथी की तरह आपके साथ चलती है।
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