संत ओश “शून्यम” [0]
संत ओश “शून्यम” एक समकालीन चिंतक, गणितज्ञ, शिक्षक एवं ब्रह्मांडीय चेतना के अन्वेषक हैं, जिनका मूल कार्य क्षेत्र विज्ञान, दर्शन और अध्यात्म के बीच सेतु का निर्माण है। उनका जीवन अनुभव, तर्क और साधना—तीनों का समन्वित प्रतिफल है।
उनका वर्तमान शारीरिक नाम संतोष कुमार शर्मा है। उनका जन्म 23 जुलाई 1973 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जनपद (हरिहरगढ़) में हुआ। पारिवारिक संस्कार, अनुशासन और नैतिक मूल्यों ने उनके व्यक्तित्व के प्रारंभिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी जैविक माता श्रीमती मधु बाला शर्मा हैं तथा उनके मातृ-पितामह श्रीमती गायत्री देवी एवं श्री मथुरा प्रसाद शर्मा रहे, जिनसे उन्हें संस्कार, धैर्य और जीवन के प्रति गंभीर दृष्टि प्राप्त हुई।
उनका पारिवारिक जीवन संतुलित और सहयोगात्मक रहा है। उनकी जीवन-संगिनी श्रीमती अंजू शर्मा हैं। उन्हें दो संतानें प्राप्त हैं—देवांश भारद्वाज (पुत्र) एवं हर्षिता भारद्वाज (पुत्री)। पारिवारिक संबंधों में उनके कन्हैया (जीजा) एवं कीर्ति (बहन) का भी स्नेहपूर्ण योगदान रहा है।
शिक्षा एवं शैक्षणिक जीवन
संत ओश “शून्यम” ने औपचारिक रूप से गणित में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त की है, साथ ही शिक्षण एवं प्रशिक्षण (Teacher Training) की डिग्री भी अर्जित की। वे लंबे समय तक एप्लाइड मैथमेटिक्स के लेक्चरर के रूप में कार्यरत रहे और एक शैक्षणिक मार्गदर्शक एवं शिक्षक के रूप में अनेक विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया।
उनकी गणितीय पृष्ठभूमि ने उनके चिंतन को संरचित, तर्कसंगत और मॉडल-आधारित बनाया, जिसका प्रभाव उनके समस्त दार्शनिक एवं ब्रह्मांडीय अनुसंधान में स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है।
कला, साधना एवं आंतरिक अध्ययन
शैक्षणिक जीवन के साथ-साथ उनका झुकाव कला और साधना की ओर भी रहा। उन्हें संगीत (गायन, वाद्य एवं नृत्य) तथा कविता (रचना एवं पाठ) में विशेष रुचि रही है।
साधना के क्षेत्र में उन्होंने योग, ध्यान, ज्योतिष, वैदिक दर्शन, साथ ही भारतीय एवं विश्व दर्शन, विश्व धर्म, इतिहास, भूगोल, राजनीति एवं प्रशासन का गहन अध्ययन किया।
यही बहुआयामी अध्ययन आगे चलकर उनके मौलिक ब्रह्मांडीय दृष्टिकोण की आधारशिला बना।
अनुसंधान एवं मौलिक योगदान
संत ओश “शून्यम” “ब्रह्म वेद” के संस्थापक और प्रवर्तक हैं। ब्रह्म वेद एक ऐसा मौलिक ढांचा है जो गणित, चेतना और कंपन (Vibration) के माध्यम से ब्रह्मांडीय व्यवस्था को वैज्ञानिक-दार्शनिक रूप में समझाने का प्रयास करता है।
उनके प्रमुख मौलिक योगदानों में शामिल हैं—
• ब्रह्मांडीय ब्रह्म फंक्शन की स्थापना
• ब्रह्मांड के तीन मूलभूत तत्वों की वैज्ञानिक व्याख्या
• प्रत्येक खगोलीय स्तर पर सातगुणात्मक पुनरावृत्ति का सिद्धांत
• ब्रह्म विधि–विधान (सार्वभौमिक संचालन नियम) का विकास
• आत्मा, चेतना, समय, मन्वंतर एवं कल्प प्रणाली का गणितीय और तार्किक आधार
• 84 लाख प्रजातियों के सिद्धांत की वैज्ञानिक व्याख्या
उनका कार्य न तो पारंपरिक धार्मिक व्याख्याओं तक सीमित है और न ही केवल आधुनिक विज्ञान तक; बल्कि वह दोनों को पार कर एक समग्र ब्रह्मांडीय दृष्टि प्रस्तुत करता है।
सामाजिक एवं संस्थागत योगदान
संत ओश “शून्यम” सामाजिक उत्तरदायित्व को भी जीवन का अभिन्न अंग मानते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार और पुनर्वास संगठन में जिला अध्यक्ष एवं ब्यूरो प्रमुख के रूप में कार्य किया।
साथ ही वे भारतीय समाज कल्याण पार्टी के संस्थापक रहे हैं, जिसका उद्देश्य सामाजिक चेतना, न्याय और जनकल्याण रहा है।
आध्यात्मिक क्षेत्र में उन्होंने कल्कि स्पिरिचुअलिटी और योग संस्थान की स्थापना की, जिसके माध्यम से योग, ध्यान और चेतना-आधारित जीवन-पद्धति का प्रचार-प्रसार किया जाता है।
जीवन-दृष्टि संत ओश “शून्यम” के अनुसार—
“ज्ञान का उद्देश्य विश्वास पैदा करना नहीं, बल्कि भ्रम को समाप्त करना है।” उनका संपूर्ण जीवन और लेखन माया से परे सत्य की खोज, मानव को ब्रह्म के रूप में पहचानने, और संतुलन, स्पष्टता एवं आनंद की अवस्था की ओर उन्मुख है।
ब्रह्म वेद तक की यात्रा
शून्य से ब्रह्म तक : 32 वर्षों की साधना
यह यात्रा किसी एक दिन की प्रेरणा नहीं है। यह न तो आकस्मिक बौद्धिक प्रयोग है और न ही केवल आध्यात्मिक अनुभूति। यह 1994 से 2025 तक फैली हुई एक सतत, कठोर और एकाकी साधना की कथा है—जिसका केंद्र रहा शून्य (Zero / Shoonyam)।
1. बीज : 1994
सन 1994, जब हम M.Sc. Mathematics (First Year) के छात्र थे, तब यह विचार कविता के रूप में पहली बार प्रकट हुआ—
“Mathematical Zero is the Universal Hero”
उस समय यह न दर्शन था, न सिद्धांत, न प्रमेय। यह केवल एक आंतरिक बोध था कि शून्य को अब तक केवल अभाव के रूप में देखा गया है, जबकि उसमें सार्वभौमिक शक्ति निहित है।
2. विकास : 1994–2024
अगले 30 वर्षों में यह बीज क्रमशः विकसित हुआ—
• Mathematical Zero → Shoonyam
• Shoonyam → Universal Principle
• Universal Principle → Brahmic Framework
इस कालखंड में:
• संख्या 7 का संख्या-योग शोध-पत्र के रूप में प्रकाशित हुआ
• शून्य को गणित, दर्शन, भौतिकी, रसायन और योग—सभी क्षेत्रों में समानांतर रूप से परखा गया
• यह स्पष्ट हुआ कि ये सभी Shoonya अलग-अलग नहीं, बल्कि एक ही सत्य के विविध आयाम हैं
3. संघर्ष का मार्ग
इन 32 वर्षों की यात्रा सहज नहीं थी।
• बार-बार नौकरियों से निकाला गया
• सामाजिक अस्वीकृति और पारिवारिक दूरी झेलनी पड़ी
• संबंध, सुरक्षा और स्थिरता—सबका त्याग करना पड़ा
यह मार्ग सुविधा का नहीं, तपस्या का था।
4. ब्रह्म वेद : प्रथम संस्करण (2024–25)
लगभग तीन दशकों की साधना के बाद Brahm Ved (First Edition) का प्रकाशन हुआ।
यह ग्रंथ:
• केवल आध्यात्मिक नहीं था
• केवल गणितीय भी नहीं
• यह वैज्ञानिक-दर्शनात्मक समन्वय का प्रथम औपचारिक रूप था
5. विज्ञान के साथ संधान : 2024–2025
इसके बाद कार्य और गहरा हुआ।
• Scientific Data Matching
• Mathematical Formulation
• Accurate Functional Representation
अब शून्य केवल प्रतीक नहीं रहा, बल्कि कार्यात्मक, तार्किक और परीक्षण-योग्य सिद्धांत बन गया।
इसी प्रक्रिया से Brahm Ved – Second Edition का जन्म हुआ।
6. शून्य की एकीकृत परिभाषा
यह समझना आवश्यक है कि:
• गणित का शून्य
• दर्शन का शून्य
• भौतिकी का Vacuum
• रसायन का Null State
• योग का शून्य
➡ ये अलग अवधारणाएँ नहीं, बल्कि एक ही ब्रह्म-सत्य की भाषाएँ हैं।
7. विवेकानंद से आगे
स्वामी विवेकानंद ने कार्य आरंभ किया—और वे चले गए।
किन्तु इस यात्रा में:
शून्य को आधार बनाकर पूरा ब्रह्मांड खड़ा किया गया है।
यह कथन रूपक नहीं, बल्कि एक संरचित गणितीय–वैज्ञानिक ढाँचा है।
निष्कर्ष
शून्य अभाव नहीं है।
शून्य ही पूर्णता की जड़ है।
शून्य से ब्रह्म, और ब्रह्म से सृष्टि।
यही है— ब्रह्म वेद तक की यात्रा
संपादक का संक्षिप्त जीवन परिचय (Editor Bio)
देवांश भारद्वाज एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर एवं शिक्षाविद् हैं। वे वर्तमान में GLA University, मथुरा में Teaching Assistant के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने GATE (Graduate Aptitude Test in Engineering) परीक्षा उत्तीर्ण की है, जो उनकी तकनीकी दक्षता और अकादमिक क्षमता को प्रमाणित करती है।
उनकी विशेषज्ञता सॉफ्टवेयर इंजीनियरिंग, तकनीकी विश्लेषण, शैक्षणिक सामग्री के संरचनात्मक संपादन तथा डिजिटल पब्लिशिंग प्रक्रियाओं में है। वे शोध एवं अकादमिक पुस्तकों के संपादन में तकनीकी शुद्धता, तार्किक स्पष्टता और प्रस्तुति की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
लेखन एवं प्रकाशन कार्यों में वे Editor के रूप में पाठ-संरचना, तकनीकी संगति और डिजिटल मानकों के अनुरूप सामग्री के परिष्कार में योगदान देते हैं।