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क्या कोमलता का अर्थ केवल टूटना है, या कोमलता का अर्थ जीवन को गढ़ना भी है?
सदियों से कवियों और साहित्यकारों ने स्त्री की तुलना फूल से की है—कभी उसकी कोमलता के लिए, तो कभी उसके सौंदर्य के लिए। लेकिन इस तुलना के पीछे छिपा वह गहरा मनोविज्ञान क्या है, जिसने स्त्री को केवल एक 'सजावट की वस्तु' बनाकर रख दिया?
सीता राम सिंह रावत की यह कृति, 'स्त्री और फूल', वनस्पति विज्ञान की कोई किताब नहीं है, बल्कि यह मानवीय संवेदनाओं, सामाजिक बेड़ियों और स्त्री के अस्तित्व की एक दार्शनिक यात्रा है। यह सफर उस नन्ही बच्ची के आंगन से शुरू होता है जो फूल में अपनी पहली 'आदिम सहेली' ढूंढती है, और उस आधुनिक नारी तक जाता है जो 'गमले' की सुरक्षा को ठुकराकर, एक 'जंगली फूल' की तरह चट्टानों पर अपनी शर्तों पर खिलने का साहस रखती है।
इस पुस्तक की मुख्य विशेषताएं:
ऐतिहासिक और मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: हज़ारों सालों से चले आ रहे स्त्री और प्रकृति के उस रिश्ते की पड़ताल, जिसे समाज ने अक्सर अनदेखा किया।
सामाजिक बेड़ियों पर प्रहार: वरमाला के अदृश्य धागों से लेकर विधवाओं से फूलों को छीने जाने तक के क्रूर सामाजिक नियमों का मार्मिक चित्रण।
आधुनिक दृष्टि: आधुनिक स्त्री के स्वावलंबन और आत्म-प्रेम (Self-love) का सशक्त समर्थन, जहाँ वह किसी माली की मोहताज नहीं है।
वैचारिक विमर्श: पुस्तक के अंत में दिया गया एक अनूठा 'बौद्धिक द्वंद्व' जहाँ लेखक स्वयं अपनी धारणाओं को कटघरे में खड़ा कर बाज़ार और सत्ता के असली जालों को उधेड़ता है।
काव्यात्मक स्पर्श: गद्य के साथ-साथ पुस्तक में पिरोई गई मर्मस्पर्शी पंक्तियाँ इसे एक मुकम्मल साहित्यिक अनुभव बनाती हैं।
राजस्थान के ग्रामीण परिवेश से निकलकर, सिविल सेवा की तैयारी कर रहे एक युवा लेखक की यह पहली कृति पाठकों को एक नए नज़रिए से सोचने पर मजबूर कर देगी। यदि आप मानते हैं कि कोमलता का अर्थ कमज़ोरी नहीं है, तो यह पुस्तक आपके लिए ही है।
स्वागत है इस महकती हुई दुनिया में, जहाँ 'खामोशी' अब केवल एक प्रतीक नहीं, बल्कि एक 'क्रांति' है।
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