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आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ

(एक काव्य संग्रह)
Advocate Naval Kishor Soni
Type: Print Book
Genre: Romance, Poetry
Language: Hindi
Price: ₹350 + shipping
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Description

मनुष्य का जीवन भावनाओं, स्मृतियों और संबंधों से बुनी हुई एक गहरी और निरंतर चलने वाली यात्रा है। इस यात्रा में कभी आनंद के क्षण आते हैं, तो कभी पीड़ा और दु:ख के पहाड़ भी सामने खड़े हो जाते हैं। कभी प्रकृति की मधुर छटा मन को नई ऊर्जा से भर देती है, तो कभी समाज और समय की विसंगतियाँ हमें भीतर तक उद्वेलित कर देती हैं। ऐसे ही अनेक अनुभव जब मन की गहराइयों में उतरकर शब्दों का रूप लेते हैं, तब कविता जन्म लेती है। प्रस्तुत काव्य-संग्रह “आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ” इसी संवेदनशील जीवन यात्रा की एक सच्ची और आत्मीय अभिव्यक्ति है।

कविता मनुष्य के अंतर्मन की वह भाषा है जो किसी औपचारिकता या आडंबर की मोहताज नहीं होती। जब कोई भावना मन को गहराई से स्पर्श करती है, जब कोई स्मृति अचानक हृदय के द्वार पर दस्तक देती है, या जब जीवन का कोई अनुभव भीतर एक प्रश्न या अनुभूति जगाता है, तब वही अनुभूति शब्दों में ढलकर कविता बन जाती है। इस काव्य-संग्रह की रचनाएँ भी जीवन के ऐसे ही अनेक क्षणों से जन्मी हैं। कभी प्रेम की कोमलता से, कभी विरह की हल्की पीड़ा से, कभी प्रकृति की मधुरता से और कभी समय और देश काल की परिस्थितियों की विडंबनाओं से।

इस संग्रह का शीर्षक “आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ” अपने भीतर एक विशेष भावात्मक संसार को समेटे हुए है। यहाँ “मीत” केवल किसी एक व्यक्ति का संकेत नहीं है; वह आत्मीयता, विश्वास और मानवीय संबंधों की उस गहराई का प्रतीक है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ती है। मीत वह होता है जो हमारे सुख-दुख में सहभागी बनता है, जो हमारे मौन को भी समझने की क्षमता रखता है, और जो हमारे जीवन की यात्रा में हमारे साथ चलने का विश्वास देता है। जब कवि कहता है, “आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ”, तो वह वस्तुतः अपने शब्दों के माध्यम से उस आत्मीयता को रचने का प्रयास करता है जो जीवन को अधिक मानवीय और अधिक खूबसूरत बनाती है।

इस काव्य-संग्रह की कविताएँ जीवन के अनेक रंगों को समेटने का प्रयास करती हैं। कहीं प्रेम की सहज मुस्कान है, कहीं स्मृतियों की हल्की आहट। कहीं मन की बेचैनी है, तो कहीं उम्मीद की एक उजली किरण। इस संग्रह की अनेक कविताओं में प्रकृति भी एक महत्त्वपूर्ण उपस्थिति के रूप में दिखाई देती है। आकाश की विशालता, चाँद की शीतलता, हवाओं की सरसराहट, ऋतुओं का परिवर्तन, ये सब मेरी कविताओं में कवि के मन के साथ जैसे संवाद करते हुए प्रतीत होते हैं। प्रकृति केवल दृश्य नहीं है; वह मनुष्य की संवेदनाओं का एक विस्तार भी है। कई बार मनुष्य अपने भीतर की भावनाओं को प्रकृति के माध्यम से अधिक सहजता से व्यक्त कर पाता है। इसलिए इस काव्य-संग्रह में प्रकृति और मनुष्य के भाव एक-दूसरे के साथ घुलते-मिलते दिखाई देते हैं।

कवि का मन केवल व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं रहता। वह अपने समय और समाज को भी सजग दृष्टि से देखता है। आज का समाज अनेक प्रकार की चुनौतियों से गुजर रहा है। बदलते जीवन मूल्य, संबंधों की जटिलता, संवेदनाओं का क्षीण होना और सामाजिक विषमताएँ, देश की वर्तमान सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक परिस्थियाँ ये सब हमारे समय की वास्तविकताएँ हैं। इस संग्रह की कुछ कविताएँ इन प्रश्नों को भी छूती हैं। वे केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं हैं, बल्कि पाठक को सोचने और अपने समय के प्रति सजग होने के लिए भी प्रेरित करती हैं।

इन रचनाओं की भाषा को यथासंभव सरल, सहज और आत्मीय रखने का प्रयास किया गया है। कविता का उद्देश्य केवल शब्दों की जटिलता या अलंकारिकता नहीं होता, बल्कि वह मनुष्य के हृदय तक सीधे पहुँचने का माध्यम भी होती है। जब शब्दों में सच्ची अनुभूति होती है, तब वे बिना किसी कठिनाई के पाठक के मन को छू लेते हैं।

कविता का वास्तविक सौंदर्य तभी पूर्ण होता है जब पाठक उसमें अपने जीवन का कोई अंश देख सके। हर पाठक अपनी स्मृतियों, अपने अनुभवों और अपनी भावनाओं के साथ कविता को पढ़ता है, इसलिए कविता के अर्थ भी हर पाठक के लिए थोड़े अलग हो सकते हैं। यही कविता की शक्ति है कि वह अनेक अर्थों और अनुभूतियों को अपने भीतर समेटे रहती है। यदि इस काव्य-संग्रह की कविताएँ पाठकों के मन में किसी स्मृति को जगा दें, किसी प्रिय संबंध की याद दिला दें या किसी विचार को जन्म दे दें, तो यही इस रचनात्मक प्रयास की सबसे बड़ी सफलता होगी।

“आओ, तुम्हें मैं मीत लिखूँ” वस्तुतः एक निमंत्रण भी है। संवेदनाओं के उस संसार में प्रवेश करने का निमंत्रण, जहाँ शब्द केवल शब्द नहीं रहते, बल्कि वे अनुभवों के जीवंत प्रतीक बन जाते हैं। यह संग्रह पाठकों को अपने भीतर झाँकने, अपने संबंधों को याद करने, देश काल की परिस्थितियों से रूबरू होने और जीवन की छोटी-छोटी सुंदरताओं को महसूस करने के लिए आमंत्रित करता है।
अंततः यह काव्य-संग्रह उसी विश्वास के साथ पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है कि कविता अभी भी मनुष्य के भीतर जीवित है। जब तक मनुष्य के हृदय में संवेदनाएँ जीवित हैं, जब तक प्रेम, स्मृति, प्रश्न और आशा जीवित हैं तब तक कविता भी जीवित रहेगी।
इसी विश्वास और आत्मीय भावना के साथ यह काव्य-संग्रह पाठकों को समर्पित है कि इन शब्दों के बीच वे अपने मन का कोई “मीत” अवश्य खोज पाएँगे।

— नवल किशोर सोनी

About the Author

नवल किशोर सोनी
माता-पिता : स्व.श्रीमती कमला देवी, स्व. श्री लड्डू लाल सोनी
जन्म: 10 नवम्बर 1974, माँगरोल, जिला बारां, राजस्थान
जीवन संगिनी: श्रीमती मंजू सोनी (प्राध्यापिका, राजकीय सीनियर माध्यमिक विद्यालय, अजमेर)
पुत्री: नव्या सोनी (अध्ययनरत)
शिक्षा: M.A. B.Ed, LL.B & MSW
सामाजिक सरोकारों से विशेष जुड़ाव। साहित्य कलाओं में अभिरुचि।
बोधि प्रकाशन, जयपुर से निराशाओं के पार काव्य संग्रह (2022) प्रकाशित, अर्पिता : एक देवदासी (उपन्यास) प्रकाशित, रिश्ता तेरा मेरा (दो न्यायाधीशों की प्रेम कहानी), उपन्यास (2026) प्रकाशित, कहानियों के आईने में जीवन कौशल (21वीं सदी के जीवन कौशलों पर आधारित कहानियाँ) पुस्तक प्रकाशित, शिक्षा में सुधार : चुनौतियाँ एवं संभावनाएं -पुस्तक प्रकाशित (2026)। कविता, कहानी एवं समसामयिक विषयों पर विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरन्तर लेखन।
'शिक्षा विमर्श' पत्रिका में शिक्षा पर विभिन्न आलेख प्रकाशित। प्रतिलिपि एप पर निरंतर कविता, कहानियाँ और लेख प्रकाशित। शिक्षा और कानून से जुड़े मुद्दों पर संवाद और लेखन में रुचि।
शिक्षा के माध्यम से बदलाव हेतु प्रयासरत।
यूनिसेफ, ऑक्सफेम, केयर इण्डिया, दिगंतर, सेव द चिल्ड्रन जैसी संस्थाओं के साथ जुड़कर विभिन्न शैक्षिक परियोजनाओं के संचालन में सहयोग। समता शिक्षा समिति, शैक्षिक सरोकार मंच और तार्किक दुनिया के संस्थापक ।

Book Details

ISBN: 9789357820820
Publisher: Naval Kishor Soni
Number of Pages: 154
Dimensions: 6"x9"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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