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“ज़िंदगी लिखता हूँ” बनारस की पृष्ठभूमि पर आधारित भावनात्मक कहानी है, जहाँ माँ के खोने के बाद टूटा-बिखरा लेखक आदित्य, एक रहस्यमयी चिट्ठी के सहारे ऋतु तक पहुँचता है—वह युवती जो ग़रीब बच्चों को पढ़ाती है और उसे जीवन को महसूस करना सिखाती है।
अनकहे रिश्ते में बंधे ये दोनों चिट्ठियों के ज़रिए जुड़ते हैं, पर किस्मत उन्हें अलग कर देती है।
ऋतु भले दूर चली जाती है, लेकिन उसके शब्द आदित्य की अधूरी कहानियों में नई साँसें भर देते हैं।
आख़िरकार आदित्य अपनी कृति “ज़िंदगी लिखता हूँ” पूरी करता है—प्रेम, बिछड़न और आत्म-बोध की उसकी अमर यात्रा।
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