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Type: Print Book
Genre: Literature & Fiction
Language: Hindi
Price: ₹299 + shipping
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Description

"क्या अपनी रूह दफ़नाकर रद्दी की डिग्रियां बटोरना ही कामयाबी है?"

यह कहानी अर्जुन की है, जिसने बचपन में अपने पिता की आँखों में 'निराशा' देखी और फिर कभी दुनिया के सामने अपनी आवाज़ नहीं उठा पाया । पिता के प्यार और एक 'काजूकतली' की कीमत चुकाने के लिए, उसने अपने सपनो—अपने कैमरे—को एक लोहे की अलमारी में हमेशा के लिए दफ़न कर दिया और उतर गया मेडिकल और सरकारी नौकरी की उस अंधी दौड़ में, जहाँ टैलेंट नहीं, सिर्फ कट-ऑफ बोलती है।

सीकर और कोटा के दमघोंटू कमरों में अर्जुन ने शिक्षा के उस 'काले सच' को जिया है, जो हर साल न जाने कितने बच्चों को ज़िंदा निगल जाता है । यह किताब उस खौफनाक रात का कच्चा चिट्ठा है, जब 510 नंबर लाकर भी एक रिक्शेवाले का बेटा 'रवि' सिस्टम से हार जाता है और कमरा नंबर 302 के पंखे से लटक जाता है... जबकि 400 नंबर लाने वाला एक रसूखदार का बेटा अपना 'सर्टिफिकेट' (VIP Pass) दिखाकर डॉक्टर बन जाता है ।

क्या सिस्टम और अपनों से हारने वाला हर लड़का 'कपूत' होता है?

डिप्रेशन, एंटी-डिप्रेसेंट की सफ़ेद गोलियां, 57 किलो का सूखता शरीर और एक बंद कमरे की घुटन के बीच... अर्जुन की लड़ाई सिर्फ इस सड़े हुए सिस्टम से नहीं, अपनी ही रूह से है। और इस घनघोर अंधेरे में उसकी इकलौती रोशनी है— 'आराध्या', जो मीलों दूर से फोन के ज़रिए उसकी टूटती साँसों को थामे रखती है ।

"कपूत" किसी जीत का जश्न नहीं है। यहाँ कोई हीरो नहीं है। यह उन हारों की झकझोर देने वाली दास्तान है, जिन पर बात करने से हम सब कतराते हैं । अगर आपने भी कभी दुनिया के तानों के डर से अपना कोई सपना मारा है, तो यह सिर्फ एक किताब नहीं, आपकी अपनी कहानी है।

About the Author

"बीकानेर (राजस्थान) के रहने वाले अनिल बिश्नोई हिंदी साहित्य (MA) और शिक्षाशास्त्र (B.Ed) के गहरे जानकार हैं। वे समाज के उन अनछुए और संवेदनशील मुद्दों पर अपनी कलम चलाने में विश्वास रखते हैं, जिन्हें अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है। 'कपूत' उनकी पहली साहसी कोशिश है।"

Book Details

Number of Pages: 204
Dimensions: 5.5"x8.5"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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