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"क्या एक वादा किसी की पूरी ज़िंदगी का सौदा हो सकता है?"
सन् 1905 का वह साल, जब बंगाल की मिट्टी को सरहदों की लकीरों से बाँटा जा रहा था। उसी शोर और धुएँ के बीच, कृष्णनगर की शांत गलियों में एक ऐसी दास्तान जन्म लेती है जिसे वक़्त भी नहीं मिटा सका।
प्रांजल, जिसकी दुनिया कविताओं और ऊँचे आदर्शों के इर्द-गिर्द घूमती है, अचानक खुद को एक ऐसे नैतिक जाल में फँसा पाता है जहाँ एक तरफ़ उसके बीमार गुरु का अटूट विश्वास है और दूसरी तरफ़ उसका अपना वजूद। ईशा, जिसकी आँखों में एक अनकहा विद्रोह है, वह उस समाज के सामने खड़ी है जहाँ औरतों की तकदीर अक्सर दूसरे लोग लिखते हैं।
जब देश का नक्शा बदला जा रहा था, तब दो दिलों के बीच भी एक ऐसी सरहद खींच दी गई जिसे लांघना नामुमकिन था। क्या प्रांजल अपने 'नैतिक कर्ज' को चुकाने की कीमत पर अपनी रूह को बचा पाएगा? क्या ईशा का 'मौन विद्रोह' उस व्यवस्था को झकझोर सकेगा जो प्रेम को बलिदान की वस्तु समझती है?
'सुख़न' एक काव्यात्मक सफर है—कर्तव्य, विरह और उस 'मौन' का, जो शब्दों से कहीं ज़्यादा गहरा है। यह कहानी है उस स्याही की, जो आंसुओं में मिलकर विसर्जन की राह तलाशती है।
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