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“ईसाई धर्म : भारत की एक विनम्र देन” एक गहन, चिंतनशील और विवेकपूर्ण कृति है, जो ईसाई परंपरा को भारत की प्राचीन सभ्यतागत चेतना के व्यापक संदर्भ में समझने का प्रयास करती है। यह पुस्तक धर्म को किसी एक मत, संस्था या ऐतिहासिक घटना तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानवीय मूल्यों, नैतिक विकास और सांस्कृतिक संवाद की सतत प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है।
लेखक इस पुस्तक में भारत को केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक ऐसी जीवंत सभ्यता के रूप में देखता है जिसने सदियों से विविध आस्थाओं, विचारधाराओं और विश्वास प्रणालियों को आत्मसात किया है। पुस्तक यह प्रश्न उठाती है कि भारत की सहिष्णु, करुणामय और संवादात्मक संस्कृति ने ईसाई विचारधारा को किस प्रकार मानवीय और नैतिक धरातल पर विकसित होने का अवसर दिया।
यह ग्रंथ न तो किसी धर्म का प्रचार करता है और न ही किसी का विरोध। इसका उद्देश्य पाठक को इतिहास, धर्म और दर्शन के बीच संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करना है। लेखक यह स्पष्ट करता है कि जब धर्म को सत्ता, संघर्ष या प्रभुत्व से अलग करके देखा जाता है, तब वह मानवता के लिए एक सेतु बन सकता है।
यह पुस्तक विद्यार्थियों, शोधार्थियों, शिक्षकों, चिंतनशील पाठकों तथा उन सभी के लिए उपयोगी है जो धर्म को मतभेद नहीं, बल्कि संवाद और समझ का माध्यम मानते हैं।
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