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‘झमेलिया बिआह’क झमेला जिनगीक स्वाभाविक रंग परिवर्तनसँ उद्भूत अछि, तँए जीवनक सामान्य गतिविधिक चित्रण चलि रहल अछि कथाकेँ बिना नीरस बनेने। नाटकक कथा विकास बिना कोनो बिहाड़िक आगू बढ़ैए, मुदा लेखकीय कौशल सामान्य कथोपकथनकेँ विशिष्ट बनबैए। पहिल दृश्यमे पति-पत्नीक बातचितमे हास्यक संग समए देवताक क्रूरता सानल बुझाइत अछि। दोसर दृश्यमे झमेलिया अपन स्वाभाविक कैशोर्यसँ समैक द्वारा तोपल खुशीकेँ खुनबाक प्रयास करैए। पहिल दृश्यमे बेकती परिस्थितिकेँ समक्ष मूक बनल अछि, आ दोसर दृश्यमे बेकतीत्व आ समैक संघर्ष कथाकेँ आगू बढ़बैत कथा आ जिनगीकेँ दिशा निर्धारित करैए। तेसर दृश्य देशभक्ति आ विधवा विवाहक प्रश्नकेँ अर्थ विस्तार दैत अछि, आ ई नाटकक गतिसँ बेसी जिनगीकेँ गतिशील करबा लेल अनुप्राणित अछि ।
चारिम दृश्यमे राधेश्याम कहै छथिन जे कमसँ कम तीनक मिलानी अबस हेबाक चाही। आ, लेखक अत्यंत चुंबकीयतासँ नाटकीय कथामे ओइ जिज्ञासाकेँ समाविष्ट कऽ दइ छथिन कि पता नै मिलान भऽ पेतै आ कि नहि। ई जिज्ञासा बरियाती-सरियातीक मारि-पीट आ समाजक कुकुर-चालिसँ निरंतर...
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