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कविताएं बोलती हैं
ये तो सच है की कवितायेँ बोलती हैं पर वो कब, कहाँ, कैसे, क्या बोलती हैं, यह जानना अति आवश्यक है। कवितायेँ यदि सामयिक हों तो पाठक या श्रोता तक अत्यंत गहनता से पहुंचती हैं।
कवितायेँ यदि ऐतिहासिक हों तो ज्ञानवर्धक होती हैं। और यदि कवितायेँ हास्य, व्यंग से ओतप्रोत हों तो कहने ही क्या। कविताएं जिस किसी भी भाव से ओतप्रोत हों, पाठकों व श्रोताओं तक उनकी पहुंच में कवि की काव्य शैली का भी बड़ा हाथ होता है। मेरा प्रयास सर्वदा ही यह रहा है कि मेरी कवितायेँ येन केन प्रकारेण श्रोताओं / पाठकों के हृदयों में स्थान पा जाएं। यदि मेरी कवतायें बोल पड़ें तो मैं स्वयं को धन्य मानता हूं। तो प्रस्तुत है मेरी बाईसवीं काव्य पुस्तिका कविताएं बोलती हैं।
पाठकों कि प्रतिक्रिया व आलोचना कि प्रतीक्षा रहेगी।
कविताएं बोलती हैं
जब जिह्वाओं पर लग जाएं ताले,
मन के भाव कोई ना निकाले।
जब दिल हो जाएं काले,
और मस्तिष्कों में लग जाएं जाले।।
तो कोनों खुदरों से निकल आती हैं,
सारे जग की व्यथा सुनाती हैं।
दिलों के भाव फरोलती हैं,
कविताएं बोलती हैं।।
जब रक्षक भक्षक बन जाए,
जनता को रह रह तड़पाये।
और उसकी वाणी को दबाये,
कोई रास्ता नज़र ना आये।।
तो,
कविताएं बोलती हैं,
हां हां,
कविताएं बोलती हैं।
कोनों खुदरों से निकल आती हैं,
सारे जग की व्यथा सुनाती हैं।
दिलों के भाव फरोलती हैं,
कविताएं बोलती हैं।।
और,
जब खुशी से मन भर आए,
और नाचने को मनवा चाहे।
विचारों की बरखा आए,
और भावों की गंगा बहाए।।
तो,
कविताएं बोलती हैं,
खुशी में डोलती हैं।
सतरंगी रंगो से भरी भावनाएं,
भावों में घोलती हैं।।
हां हां,
कविताएं बोलती हैं।
कविताएं बोलती हैं।।
सुभाष सहगल
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