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राहुल सिंह जब विदेश से अपने देश लौटा, तो उसकी यह वापसी किसी विजय यात्रा की तरह नहीं थी।
उसके पिता, हरदेव सिंह, देश के सबसे प्रभावशाली मीडिया समूह में से एक के मालिक थे। ऐसा मीडिया जो सत्ता का आईना नहीं, बल्कि उसका कवच बन चुका था। सच अगर सत्ता के खिलाफ़ जाता, तो उसे या तो तोड़-मरोड़ दिया जाता था या फिर पूरी तरह दफ़ना दिया जाता था। यही कारण था कि राहुल सिंह यह देश छोड़ गया था। उसने विदेश में एक ऐसे मीडिया हाउस में काम किया, जहाँ सवाल पूछना अपराध नहीं था और सच को कीमत नहीं चुकानी पड़ती थी।
लेकिन अब हालात बदल चुके थे। पिता की तबीयत लगातार बिगड़ रही थी। डॉक्टरों की आवाज़ में उम्मीद कम और औपचारिकता ज़्यादा थी। राहुल समझ गया था यह बुलावा सिर्फ़ बेटे के लिए नहीं था, उत्तराधिकारी के लिए भी था। कुछ ही दिनों बाद हरदेव सिंह चले गए।
पिता की चिता ठंडी भी नहीं हुई थी कि बोर्डरूम की राजनीति गर्म होने लगी थी। वही चेहरे, वही मुस्कानें, वही सौदे। राहुल ने सोचा था कि वह व्यवस्था बदलेगा। उसने संपादकीय बैठकों में सवाल उठाए, रिपोर्ट्स को रोका, कुछ फाइलें खुलवाईं। लेकिन बहुत जल्दी उसे यह एहसास हो गया कि यहाँ सच की कीमत बहुत भारी है।
उसने देखा था, जो लोग सिस्टम से टकराने की कोशिश करते हैं, वे या तो झुक जाते हैं या टूट जाते हैं। कुछ मीडिया हाउस दिवालिया हो चुके थे, कुछ मालिक रहस्यमय चुप्पी में चले गए थे। यह लड़ाई बाहर से नहीं जीती जा सकती थी।
राहुल ने तब एक फैसला लिया, सबसे कठिन और सबसे ख़तरनाक फैसला। अगर शेर को हराना है, तो पहले उसके साथ चलना होगा।
राहुल अब अलीबाबा बन चुका था, चोरों की गुफ़ा में मौजूद, उन्हीं में से एक, लेकिन उनकी हर चाल पर नज़र रखता हुआ। बाहर से सत्ता का समर्थक, भीतर से उसका सबसे ख़तरनाक विरोधी।
क्योंकि उसे पता था, इस देश में अब सच चीखकर नहीं, फुसफुसाकर ज़िंदा रहता है।
और यह कहानी उसी फुसफुसाहट से शुरू होती है।
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