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“प्रेम का आशीष” केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि संवेदनाओं का एक जीवंत संसार है। यह काव्य-रचना प्रेम को किसी एक रूप में बाँधने का प्रयास नहीं करती, बल्कि उसे जीवन की हर परत में महसूस कराती है—माँ के आँचल से लेकर प्रिय की मुस्कान तक, मित्रता की सादगी से लेकर आत्मसम्मान की गरिमा तक। इस काव्य में प्रेम कोई दिखावटी भाव नहीं, बल्कि मनुष्य को बेहतर बनाने वाली शक्ति है। “प्रेम का आशीष” की कविताएँ सरल भाषा में गहरी बात कहती हैं। यहाँ प्रेम को पीड़ा से अलग नहीं किया गया, बल्कि उसे पीड़ा में भी अर्थ देने वाला भाव माना गया है। विरह, प्रतीक्षा, त्याग और क्षमा—ये सभी भाव इस काव्य में स्वाभाविक रूप से बहते हैं। कवि प्रेम को अधिकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानता है; वह सिखाता है कि प्रेम में समर्पण है, पर आत्मविलय नहीं। इस काव्य की खासियत यह है कि यह प्रेम को सामाजिक और मानवीय संदर्भों से जोड़ता है। प्रेम यहाँ केवल दो व्यक्तियों के बीच सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज, प्रकृति और विचारों तक फैल जाता है। कभी यह खेतों में पसीना बहाते किसान के लिए सम्मान बन जाता है, तो कभी अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस। इस तरह “प्रेम का आशीष” संवेदना को चेतना में बदल देता है। कविताओं की लय पाठक को ठहरकर सोचने पर मजबूर करती है। प्रतीकों और बिंबों का प्रयोग सहज है, जिससे भावनाएँ बोझिल नहीं होतीं। हर कविता अंत में एक मौन छोड़ जाती है—ऐसा मौन जिसमें पाठक अपने अनुभवों की आवाज़ सुन पाता है। कुल मिलाकर, “प्रेम का आशीष” प्रेम का उत्सव है—ऐसा उत्सव जो सिखाता है कि प्रेम केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि देने, समझने और मनुष्य बने रहने का आशीर्वाद है।
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