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रामदरश मिश्र हिंदी साहित्य के उन मूर्धन्य साहित्यकारों में से एक हैं; जिन्होंने आधुनिक युग की पारिवारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक जटिलताओं का न केवल अनुभव किया ; बल्कि अपनी रचनाओं में उन्हें अत्यंत प्रामाणिकता के साथ अभिव्यक्त भी किया है । साहित्य जगत में उनका लेखन केवल उपन्यास विधा तक सीमित नहीं रहा है; बल्कि कविता, कहानी, निबंध , आलोचना, संस्मरण, यात्रा-वृत्तांत इत्यादि क्षेत्र में भी उनकी रचनाओं ने अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज की है ; किन्तु यह कहना भी उचित होगा कि एक उपन्यासकार के रूप में उनका योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा है; क्योंकि उन्होंने अपने उपन्यासों के माध्यम से न केवल ग्रामीण और शहरी भारत का यथार्थ प्रस्तुत किया है ; बल्कि मानवीय मूल्यों और संबंधों की युगानुकूळ एवं तर्कसम्मत नवीन व्याख्याएँ भी प्रस्तुत की हैं। उनके उपन्यासों में अभिव्यंजित भारतीय ग्रामीण- जीवन केवल वर्णनात्मक न होकर अनुभवजन्य और आत्मीयता से परिपूर्ण दिखाई पड़ता है। 'पानी के प्राचीर', 'जल टूटता हुआ', 'सूखता हुआ तालाब', 'अपने लोग', 'आकाश की छत', 'आदमी राग', 'थकी हुई सुबह', 'बीस बरस' और 'परिवार' जैसे उपन्यासों में उन्होंने सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक विघटन, संबंधों के द्वंद्व और मूल्यों के संक्रमण को बड़ी सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया है। वर्तमान समय में जब समाज में आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक संकट गहराता जा रहा है ; ऐसे समय में रामदरश मिश्र जैसे साहित्यकार का लेखन एक दिशा-संकेतक की भूमिका निभाता है। उनके उपन्यासों में परंपरा और आधुनिकता के द्वंद्व, मूल्यबोध की टूटन, संबंधों की जटिलताएँ और मनुष्य की संवेदनात्मक चेतना के विविध आयाम उजागर होते हैं।तकनीकी प्रगति ने जहाँ जीवन को आसान बनाया है ; तो वहीं इसने संबंधों में कृत्रिमता, आत्मविस्मृति और नैतिक विचलन भी उत्पन्न किए हैं। ऐसे समय में मिश्र जी के उपन्यासों में निहित संवेदनशील दृष्टिकोण, मानवीय मूल्यबोध और आत्मीय संबंधों की पड़ताल करना न केवल साहित्यिक स्तर पर महत्वपूर्ण है; बल्कि सामाजिक और नैतिक स्तर पर भी अत्यंत उपयोगी है।
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