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क्या आप अक्सर दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार जीते हुए खुद को थका हुआ महसूस करते हैं?
क्या आप जानते हुए भी सही निर्णय नहीं ले पाते, क्योंकि किसी को निराश करने का डर बीच में आ जाता है?
“जीवन में खड़े रहना सीखिए” उन लोगों के लिए लिखी गई किताब है जो
समझदार हैं, संवेदनशील हैं, लेकिन भीतर कहीं महसूस करते हैं कि वे
धीरे-धीरे खुद को छोड़ते जा रहे हैं।
यह किताब आपको यह नहीं सिखाती कि
आप क्या सोचें।
यह सिखाती है कि आप कैसे कर्म करें
तब भी जब डर मौजूद हो,
तब भी जब स्वीकृति न मिले,
तब भी जब स्थिति असहज हो।
इस किताब में आप सीखेंगे:
बिना अनुमति माँगे सही निर्णय कैसे लें
स्वीकृति की ज़रूरत के बिना सीमाएँ कैसे बनाएँ
अपराधबोध के बिना “ना” कहना कैसे सीखें
प्रेरणा न होने पर भी कर्म कैसे चुनें
अतीत से प्रभावित हुए बिना वर्तमान में खड़े रहना
संघर्ष, निराशा और असहजता को कमजोरी नहीं, स्वतंत्रता का प्रमाण मानना
यह कोई मोटिवेशनल किताब नहीं है।
यह कोई “सब ठीक हो जाएगा” वाली किताब भी नहीं है।
यह एक व्यावहारिक मार्गदर्शिका है
छोटे लेकिन सच्चे अभ्यासों की,
जो आपको यह सिखाते हैं कि
कैसे एक ऐसा जीवन जिया जाए
जिसके साथ आप चुपचाप, बिना सफ़ाई दिए खड़े रह सकें।
यह किताब किसके लिए है?
जो बहुत सोचते हैं, लेकिन कम जी पाते हैं
जो समझदार हैं, पर अक्सर खुद को पीछे रख देते हैं
जो अच्छे इंसान हैं, लेकिन भीतर से थक चुके हैं
जो शांति चाहते हैं, लेकिन दिखावे वाली खुशी नहीं
यह किताब किसके लिए नहीं है?
जो त्वरित समाधान या भावनात्मक दिलासा चाहते हैं
जो बदलाव बिना असहजता के चाहते हैं
अगर आप ऐसा जीवन चाहते हैं
जहाँ हर निर्णय पर तालियाँ न भी मिलें,
फिर भी आप खुद से नज़र मिला सकें
तो यह किताब आपके लिए है।
स्वतंत्रता अचानक नहीं आती।
वह धीरे-धीरे बनती है
हर उस क्षण में
जब आप खुद को छोड़े बिना
एक सही चुनाव करते हैं।
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