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माँ का हिस्सा
Written by Sir Krishna
एक माँ…
जिसने अपने सपनों को बच्चों की पढ़ाई में बदल दिया।
अपने गहनों को फीस में,
और अपने पूरे जीवन को बच्चों के भविष्य में गला दिया।
चार बेटे, दो बेटियाँ—
सबको बराबर प्यार मिला,
लेकिन जब बुढ़ापा आया,
तो माँ खुद “बराबरी का हिस्सा” बना दी गई।
जब ज़मीन बाँटी गई,
तो माँ भी बाँटी गई—
तीन-तीन महीनों के लिए।
हर घर में माँ रही,
लेकिन किसी घर में जगह नहीं मिली।
“माँ का हिस्सा”
सिर्फ़ एक कहानी नहीं है—
यह उस समाज का आईना है
जहाँ संस्कार मंच पर दिखाए जाते हैं
और संवेदनाएँ पर्दे के पीछे दम तोड़ देती हैं।
यह पुस्तक आपको रुलाएगी,
चुप कर देगी,
और शायद…
अपने माँ-बाप के पास बैठने पर मजबूर कर देगी।
अगर आपके माता-पिता ज़िंदा हैं,
तो यह किताब अभी पढ़िए।
और अगर नहीं हैं,
तो यह किताब आपको देर से मिलेगी।
यह कहानी पढ़ी नहीं जाती—
सीधे दिल में उतरती है।
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