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यदि प्रेम कभी बाँधने के लिए था ही नहीं —
तो फिर हमने उसे बंधन क्यों बना दिया?
आज के समय में प्रेम को अनुबंध, अपेक्षा, सुरक्षा और सामाजिक स्वीकृति से जोड़ दिया गया है।
जहाँ प्रेम होना चाहिए था स्वतंत्रता और चेतना का अनुभव,
वहाँ वह नियंत्रण, डर और अधिकार का रूप ले चुका है।
“प्रेम : बंधन नहीं, बोध” भावनात्मक उपदेशों की पुस्तक नहीं है।
यह प्रेम पर आधारित एक तार्किक, दार्शनिक और आत्मचिंतनात्मक विमर्श है —
जो प्रेम को उसके मूल स्वरूप में देखने का साहस करता है।
यह पुस्तक सवाल उठाती है:
क्या प्रेम वचनों का मोहताज होता है?
क्या सुरक्षा और अधिकार प्रेम को बचाते हैं या नष्ट करते हैं?
क्या समाज प्रेम को समझता है या केवल उसे नियंत्रित करता है?
क्या ईर्ष्या, डर और नियंत्रण वास्तव में प्रेम के प्रमाण हैं?
लेखक यह स्पष्ट करता है कि
प्रेम कोई माँगी जाने वाली वस्तु नहीं,
कोई सिद्ध करने योग्य प्रमाण नहीं,
और न ही कोई सामाजिक संस्था है।
प्रेम यहाँ चेतना की अवस्था है —
जहाँ न भय है, न अधिकार, न शर्तें।
इस पुस्तक में प्रेम को:
व्यक्ति से परे मनुष्यता तक विस्तारित किया गया है
सामाजिक बंधनों से मुक्त करके समझा गया है
निस्वार्थ, स्वतंत्र और शांत स्वरूप में प्रस्तुत किया गया है
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है
जो प्रेम को केवल महसूस नहीं, समझना चाहते हैं;
जो रिश्तों में स्वतंत्रता को खोना नहीं, जीना चाहते हैं;
और जो यह जानना चाहते हैं कि प्रेम वास्तव में क्या है —
और क्या नहीं।
यह पुस्तक प्रेम सिखाती नहीं —
बल्कि प्रेम को देखने की दृष्टि देती है।
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