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इधर पिछले कुछ दिनों से मेरी पत्नी के मन में गुबार उठ रहा है कि मिट्टी के गुल्लकों की भी भला कोई उम्र होती है, जितने दिन जी गई बस उतनी ही होती है जिंदगी। जिस शरीर से हम इतना प्यार करते हैं जिसके लिये आज स्त्री पुरुष समान रूप से क्या कुछ नहीं करते कि वे जीवन पर्यंत ऐसे दिखें जिनके रूप की दुनिया गुणगान करे। आखिर यह रूप ही तो है जो स्त्री पुरुष के मध्य युग युगांतर से आकर्षण का केंद्र बिंदु रहा है। यह जानते हुए भी शारीरिक सुंदरता से अधिक कहीं आवश्यकता इस बात की होती है कि एक स्वस्थ रिश्ते के लिए स्त्री पुरुष दोनों के मन मिलने चाहिए।
इन्हीं प्रश्नों की तलाश ही इस कथानक की सूत्रधार बनने जा रही है जिसका पूरा श्रेय रमा के नाम।
तनिष्क जिसको अपने तन से इश्क हो उसे कहते हैं ‘तनिष्क’। नहीं जानता हूँ और न ही...
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