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क्या कर्म केवल भाग्य है?
क्या यह किसी अदृश्य न्यायालय का निर्णय है?
या यह हमारे अपने ही भीतर चल रही स्मृतियों और प्रतिक्रियाओं की प्रक्रिया है?
कर्म दर्शन कर्म को भय, दंड और भाग्य की संकीर्ण धारणाओं से बाहर निकालकर एक जीवित, चेतन प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत करती है। यह पुस्तक बताती है कि कर्म केवल बाहरी क्रिया नहीं, बल्कि हमारी स्मृतियों, आदतों, प्रतिक्रियाओं और पहचान का सतत निर्माण है।
जब हम देखना सीखते हैं कि हमारी प्रतिक्रिया ही हमारी स्मृति है, और स्मृति ही कर्म का बीज है, तब जीवन बदलने लगता है।
यह पुस्तक धर्मोपदेश नहीं देती, न किसी नए सिद्धांत का आग्रह करती है। इसका एक ही निमंत्रण है—देखने का।
बंधन से चेतना तक की यह यात्रा पाठक को स्वयं के भीतर उतरने का साहस देती है।
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