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“रिश्ते धीरे-धीरे मरते हैं” एक ऐसा उपन्यास है जो परिवार और रिश्तों की सच्चाई को सामने लाता है। इस कहानी में एक ऐसे पिता के जीवन को दिखाया गया है जिसने अपने बच्चों के लिए सब कुछ किया, लेकिन समय के साथ वही घर और वही रिश्ते बदलने लगते हैं।
छोटी-छोटी बातों से शुरू हुई दूरियाँ धीरे-धीरे दिलों में जगह बना लेती हैं और एक समय ऐसा आता है जब रिश्ते होते हुए भी उनमें अपनापन नहीं बचता। यह उपन्यास पाठकों को यह सोचने पर मजबूर करता है कि अगर समय रहते समझ और प्रेम न रहे, तो मजबूत से मजबूत रिश्ता भी कमजोर पड़ सकता है।
यह कहानी हर उस इंसान के दिल को छू सकती है जिसने कभी रिश्तों के टूटने का दर्द महसूस किया हो।
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