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रेल की एक साधारण-सी बोगी में तीन बर्थ होती हैं; लोअर, मिडिल और अपर। पहली नज़र में वे केवल यात्रा की सुविधा लगती हैं, पर यदि ठहरकर देखा जाए तो मनुष्य का जीवन भी कुछ इसी क्रम में बँटा हुआ प्रतीत होता है। जन्म लेते ही उसका लोअर बर्थ मानो निश्चित हो जाता है, क्योंकि जन्म हमारे हाथ में नहीं होता। उसी तरह मृत्यु के साथ उसका अपर बर्थ भी तय है। मृत्यु हमारे वश में नहीं; वहाँ पहुँचना हमारी इच्छा या नियंत्रण से परे है। हम इस संसार में स्थायी यात्री नहीं, बल्कि एक सीमित समय के मुसाफ़िर हैं, जिन्हें कुछ दूर साथ चलने और फिर अपने-अपने स्टेशन पर उतर जाना होता है।
इन दोनों के बीच जो समय हमें मिलता है, वही हमारा वास्तविक जीवन है, जिसे हम मिडिल बर्थ कह सकते हैं। अस्थायी होते हुए भी यही जीवन सबसे अधिक अर्थपूर्ण होता है, क्योंकि पहचान पाने, स्वीकृति खोजने और जीने की सारी सच्ची लड़ाइयाँ और अनुभव इसी के भीतर घटित होते हैं। इसी मिडिल बर्थ पर मनुष्य अंततः उस सबसे बड़ी अनुभूति को जीता है, जिसे हम प्रेम कहते हैं।
S4, 37, Middle Berth उसी “बीच” की कहानी है, एक सीट नंबर, जो देखने में साधारण है, पर मेरे लिए वह उस क्षण का प्रतीक है जहाँ दो जीवन पहली बार एक-दूसरे से टकराते हैं; जहाँ भविष्य अभी बोझ नहीं बना और अतीत अभी कठोर नहीं हुआ। जीवन का मिडिल बर्थ तर्क से नहीं चलता। वहाँ जो होता है, वह धीरे-धीरे, अनकहे शब्दों में, दृष्टि और मौन के बीच घटित होता है। सिवान से इलाहाबाद तक की एक दिन की यात्रा में दो युवा पहली बार एक-दूसरे की उपस्थिति को गंभीरता से महसूस करते हैं। कभी-कभी जीवन को बदल देने के लिए कुछ घंटों की निकटता ही पर्याप्त होती है।
एक लेखक के रूप में, मैं यह मानता हूँ कि प्रेम का सबसे निष्कलुष और निर्भीक रूप मनुष्य के जीवन में एक विशेष आयु में ही प्रकट होता है, लगभग सत्रह-अठारह से तेईस-चौबीस वर्ष के बीच। इससे पहले बचपना होता है; जीवन की गंभीरता का बोध अधूरा रहता है। इसके बाद समझ बढ़ती है और उसी के साथ गणना भी बढ़ने लगती है, भविष्य का हिसाब, समाज की दृष्टि, लाभ-हानि का संतुलन, चिंताएँ और स्वार्थ। पर इस मध्यवर्ती आयु में, जब हृदय अभी कठोर नहीं हुआ होता और बुद्धि अभी अत्यधिक चतुर नहीं बनी होती, तब जो प्रेम जन्म लेता है, वह न लाभ देखता है, न हानि, न शर्त, न परिणाम। वह केवल हृदय से उपजता है और उसी पर विश्वास करता है। वही प्रेम सबसे सच्चा प्रतीत होता है।
इस पृथ्वी का सबसे जिद्दी और रहस्यमय चरित्र यदि कोई है तो वह स्त्री है। उसे परिभाषाओं में बाँधा नहीं जा सकता, उसे अधिकार से जीता नहीं जा सकता और उसे तर्क से पूरी तरह समझा नहीं जा सकता। उसे पूरी तरह समझ लेने का दावा करना स्वयं एक भ्रम है। वह स्वयं में एक स्वतंत्र संसार है। उसे केवल प्रेम से स्पर्श किया जा सकता है, उसे केवल प्रेम से समझाया जा सकता है और उसे केवल प्रेम से ही समझा जा सकता है।
किंतु विडंबना यह है कि वह प्रेम, जो सच में उसके भीतर तक उतर सके, अत्यंत दुर्लभ होता है, क्योंकि उस प्रेम को केवल कहकर नहीं, बल्कि सचमुच प्रेम करके दिखाना पड़ता है। और ऐसा प्रेम करने वाला व्यक्ति बहुत विरला जन्म लेता है।
इस उपन्यास के दो पात्र भी इसी आयु-सीमा में खड़े हैं। इस कथा की युवती अनुशासित है, घर से स्पष्ट सीख लेकर निकली हुई कि उसे अपने लक्ष्य से विचलित नहीं होना है; उसे पढ़ाई करनी है, भविष्य बनाना है, दूरी बनाए रखनी है। वह सजग है, संयत है, और दुनिया को एक सीमित दायरे से देखती है। दूसरी ओर कार्तिक है, जो घर का लाड़ला, स्नेह में पला, थोड़ा अल्हड़, अभी जिम्मेदारियों की कठोरता से अनभिज्ञ। आरंभ में वह युवती उसे देखना भी नहीं चाहती; उसके भीतर सावधानी है।
पर जीवन के मिडिल बर्थ में भावनाएँ तर्क से अधिक तीव्र होती हैं। सिवान से इलाहाबाद तक की इस यात्रा में समय उनके बीच संवाद की एक पतली-सी रेखा खींच देता है। इस यात्रा में, बिना किसी बाहरी संघर्ष के, बिना किसी खलनायक के, उनके बीच जो जन्म लेता है, वह केवल प्रेम है; न वादा, न बंधन, न विद्रोह; केवल सहज स्वीकृति।
यह कथा उसी लाखों में एक कार्तिक की है। वह कोई असाधारण नायक नहीं, बल्कि एक साधारण युवक है; पर उसके प्रेम की सादगी असाधारण है। उसने किसी तर्क, आग्रह या प्रदर्शन से नहीं, बल्कि अपने सीधे और सच्चे प्रेम से एक जिद्दी और रहस्यमयी स्त्री के हृदय पर ऐसा प्रहार किया कि उसकी वर्षों पुरानी पहेली धीरे-धीरे सुलझने लगी। उसने उसे जीतने की कोशिश नहीं की, बल्कि उसे समझने का धैर्य रखा। उसके प्रेम में न शोर था, न दावा; केवल निरंतरता और विश्वास था। और शायद यही कारण था कि जो स्त्री किसी के आगे नहीं झुकी, वह उसके प्रेम के सामने पिघल गई। कार्तिक ने कुछ असाधारण करके नहीं, बल्कि प्रेम को सचमुच जीकर वह कर दिखाया, जिसे सच में जी पाना हर किसी के बस की बात नहीं।
सन् 2000 में, सिवान से इलाहाबाद तक की एक दिन की रेलयात्रा में घटित यह कथा बाहर से भले ही सीमित लगे, पर भीतर से यह जीवन के एक अत्यंत सूक्ष्म और सच्चे अनुभव को पकड़ने का प्रयास है। यह मेरा पहला उपन्यास है। संभव है कि इसमें अनुभव की परिपक्वता न हो, पर इसमें उस विश्वास की सच्चाई अवश्य है कि निष्पाप प्रेम आज भी संभव है।
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