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खिड़की के पार केवल कहानियों की किताब नहीं है,
यह ज़िंदगी को देखने का एक नज़रिया है।
कहीं बचपन की शरारतें हैं,
तो कहीं चुनाव और पैसे की कड़वी सच्चाई।
कहीं मोह और प्रेम की ख़ामोशी है,
तो कहीं डर, अपराध और इंसान के भीतर छिपा अंधेरा।
“पहला बंक” आपको बचपन की मासूम चालाकियों में ले जाता है,
“चुनाव का दिन” समाज और राजनीति का नंगा सच दिखाता है,
“पैसे” खुद पैसे की ज़ुबानी उसकी पूरी यात्रा सुनाता है,
“ज़िंदगी लगाव की” इंसान और जानवर के रिश्ते को दिल से महसूस कराता है,
“डॉन” ताक़त, डर और सत्ता की कहानी कहता है,
और “अनोखा डर”, “आईना”, “एक निर्णय” जैसी कहानियाँ
पाठक को सोचने पर मजबूर कर देती हैं।
इन कहानियों में कोई परीकथा नहीं है,
कोई बनावटी हीरो नहीं है।
यहाँ इंसान है —
अपनी कमज़ोरियों, गलतियों, फैसलों और पछतावे के साथ।
खिड़की के पार उन पाठकों के लिए है
जो किताबों में सिर्फ़ मनोरंजन नहीं,
बल्कि खुद को ढूँढना चाहते हैं।
अगर आप ऐसी कहानियाँ पढ़ना चाहते हैं
जो पढ़ने के बाद भी आपके साथ चलती रहें,
तो यह किताब आपके लिए है।
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