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संगम-ए-इश्क़
मोहब्बत, ख़ामोशी और रूह के एहसासों का एक नर्म लेकिन गहरा संगम है।
यह किताब सिर्फ़ इश्क़ की दास्तान नहीं कहती, बल्कि उन ख़ामोश लम्हों को भी आवाज़ देती है जहाँ दिल बोलता है और लफ़्ज़ चुप रह जाते हैं।
इन पन्नों में कहीं अधूरी मुलाक़ातें हैं,
कहीं जुदाई का दर्द,
कहीं सुकून की तलाश
और कहीं वो एहसास—
जो नाम नहीं लेता, पर पूरी ज़िंदगी साथ रहता है।
हर शायरी किसी एक चेहरे की नहीं,
बल्कि उन तमाम दिलों की कहानी है
जिन्होंने कभी शिद्दत से चाहा,
ख़ामोशी में जिया
और अल्फ़ाज़ों में खुद को ढूंढा।
संगम-ए-इश्क़
उन पाठकों के लिए है
जो पढ़ते नहीं—महसूस करते हैं।
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