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यह पुस्तक किसी कथा का विस्तार नहीं, बल्कि उन ठहरे हुए क्षणों का संकलन है - जो घट तो गए, पर समय पर कहे नहीं जा सके। मौन प्रतिक्षा प्रेम की उस अवस्था को लिखने का प्रयास है, जहाँ पाना उद्देश्य नहीं रह जाता और छोड़ देना भी हार नहीं बनता। यहाँ विरह कोई शिकायत नहीं, बल्कि स्वीकार का एक शांत, सधा हुआ रूप है। इन पन्नों में कविता, पत्र और स्मृति - तीनों एक साथ साँस लेते हैं।
कहीं कविता पत्र बन जाती है, कहीं पत्र स्मृति में बदल जाता है, और कहीं स्मृति ही एक अधूरी कथा का रूप ले लेती है। यह लेखन किसी निष्कर्ष की ओर नहीं दौड़ता; यह ठहरता है, लौटता है, और फिर मौन में आगे बढ़ जाता है।
इन कविताओं में कहीं आग्रह नहीं है, कहीं पुकार नहीं है। बस एक ठहराव है- जो जाने देता है, और फिर भी प्रतीक्षा करता है।
यह पुस्तक उस प्रेम की बात करती है जो अधिकार नहीं माँगता,
उस मर्यादा की, जो दूरी नहीं बल्कि गहराई रचती है,
और उस प्रतीक्षा की, जो शोर नहीं करती-बस समय को अपना साक्षी बना लेती है।
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो शब्दों से अधिक मौन को समझते हैं; जो जानते हैं कि कुछ संबंध रुकने से नहीं, ठहरने से जीवित रहते हैं। यदि इन पंक्तियों में आपको अपना कोई अनकहा क्षण, कोई ठहरी हुई अनुभूति मिल जाए- तो यही इस लेखन की पूर्णता होगी।
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