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कुछ लोग गाँव छोड़ते हैं सपनों के लिए। कुछ सपने वहीं छूट जाते हैं। गोपाल प्रसाद पढ़ाई के दम पर गाँव से शहर और शहर से विदेश तक पहुँच जाता है। ऑक्सफ़ोर्ड जाने से पहले, एक चिट्ठी उसे वापस उसी जगह बुला लेती है, जहाँ से वह कभी भाग आया था। वहाँ उसे मिलता है—वही समाज जो गलत को जानते हुए भी चुप रहता है, वही दोस्त जिनकी ज़िंदगी डर ने तोड़ दी, और वही माँ जो अब भी इंतज़ार करती है। और उन्हीं रातों में, छत पर, उसकी मुलाक़ात होती है प्रभा से—तीखी, संवेदनशील और सच बोलने वाली। हँसी-मज़ाक में शुरू हुई बातें धीरे-धीरे उन सवालों तक पहुँच जाती हैं, जिनसे गोपाल हमेशा बचता रहा। लेकिन कुछ सच्चाइयाँ देर से सामने आती हैं। और कुछ प्रेम… बहुत देर से।
यह कहानी है उस क़ीमत की, जो सफलता वसूलती है। उस चुप्पी की, जो अपराध बन जाती है। और उस प्रेम की, जो मिलकर भी साथ नहीं चल पाता। क्योंकि कभी-कभी ऊपर पहुँच जाना ही हार होता है।
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