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फिर वही कोहरा
भय के जन्म पर आधारित एक मनोवैज्ञानिक हॉरर उपन्यास है।
एक साधारण-से दिखने वाले गाँव में सब कुछ पहले जैसा ही था—बच्चों की हँसी, शाम की शांति और रात के अँधेरे में सुनाई देने वाली कहानियाँ। लेकिन धीरे-धीरे कुछ बदलने लगा। पहले एक अफ़वाह फैली, फिर एक अजीब-सी बेचैनी लोगों के भीतर घर करने लगी। किसी ने कहा कि कब्रिस्तान में किसी को देखा गया है। किसी ने कहा कि धुंध में कोई चल रहा था। और फिर—लोगों ने एक-दूसरे पर भरोसा करना भी कम कर दिया।
यहाँ भय अचानक नहीं आता। वह धीरे-धीरे फैलता है—बातों में, शक में, और लोगों के मन में। अफ़वाहें सच लगने लगती हैं, रस्में सुरक्षा बन जाती हैं, और वास्तविकता तथा कल्पना के बीच की रेखा धुंधली होने लगती है।
यह कहानी किसी राक्षस से लड़ने की नहीं है।
यह उस क्षण की कहानी है जब डर जन्म लेता है—और धीरे-धीरे पूरे गाँव को अपनी गिरफ्त में ले लेता है।
भाग एक: उस यात्रा का पहला कदम है, जहाँ भय केवल महसूस नहीं किया जाता—बल्कि धीरे-धीरे जीवित हो उठता है।
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