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“डिजिटल दाग़: गाँवों की लड़कियों पर एआई का असर” एक मार्मिक, जागरूकता-प्रधान और सामाजिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण पुस्तक है, जो डिजिटल युग की बदलती वास्तविकताओं को ग्रामीण भारत के संदर्भ में गहराई से प्रस्तुत करती है। यह केवल एक कहानी नहीं, बल्कि एक सामाजिक दस्तावेज़ है—जो दिखाता है कि तकनीक की प्रगति के साथ-साथ उसके दुरुपयोग के खतरे भी किस तरह समाज के सबसे संवेदनशील वर्ग, विशेषकर गाँवों की लड़कियों, को प्रभावित कर रहे हैं।
पुस्तक की शुरुआत एक साधारण से गाँव के वातावरण से होती है—जहाँ जीवन सरल है, रिश्ते निकट हैं, परंपराएँ मजबूत हैं और “इज्जत” सामाजिक व्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसी परिवेश में एक मासूम, मेधावी और सपने देखने वाली बच्ची की दुनिया बसती है। उसके सपने बड़े हैं, लेकिन साधन सीमित। एक साधारण मोबाइल फोन, जो शिक्षा और संपर्क का माध्यम होना चाहिए था, धीरे-धीरे उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा संकट बन जाता है।
कहानी का मोड़ तब आता है जब उसकी एक साधारण तस्वीर को एआई आधारित तकनीक की सहायता से बदल दिया जाता है। यह तथाकथित “डीपफेक” सामग्री देखने में वास्तविक लगती है, परंतु वह पूरी तरह कृत्रिम होती है। इसी डिजिटल छेड़छाड़ के माध्यम से ब्लैकमेल की शुरुआत होती है। धमकियाँ, पैसे की मांग, और बदनामी का डर—इन सबका बोझ एक छोटी बच्ची के कंधों पर आ गिरता है।
यह पुस्तक केवल घटना का वर्णन नहीं करती, बल्कि उस मानसिक और सामाजिक संरचना का विश्लेषण भी करती है, जो ऐसे अपराधों को बढ़ावा देती है। ग्रामीण समाज में सम्मान और प्रतिष्ठा का अर्थ अक्सर लड़की के चरित्र से जोड़ दिया जाता है। परिणामस्वरूप, जब कोई डिजिटल अपराध होता है, तो अपराधी की बजाय पीड़ित पर सवाल उठाए जाते हैं। यही सोच ब्लैकमेलर की सबसे बड़ी ताकत बनती है। डर और शर्म के कारण पीड़ित चुप रह जाती है, और अपराधी बार-बार उसका शोषण करता है।
पुस्तक में पीड़ित के मानसिक संघर्ष को अत्यंत संवेदनशीलता से प्रस्तुत किया गया है। नींद न आना, पढ़ाई में गिरावट, आत्मविश्वास की कमी, अवसाद, सामाजिक दूरी और आत्म-संदेह—ये सब उस अदृश्य घाव के परिणाम हैं, जो डिजिटल दुरुपयोग से बनते हैं। लेखक स्पष्ट करते हैं कि साइबर अपराध केवल तकनीकी समस्या नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संकट भी है। विशेष रूप से बच्चों और किशोरियों के लिए यह प्रभाव दीर्घकालिक हो सकता है।
कहानी के साथ-साथ पुस्तक तथ्यात्मक और व्यावहारिक जानकारी भी प्रदान करती है। इसमें बताया गया है कि एआई और डीपफेक तकनीक क्या हैं, वे कैसे काम करती हैं, और किस प्रकार उनका दुरुपयोग किया जाता है। सरल भाषा में समझाया गया है कि डिजिटल सामग्री की सत्यता की जाँच कैसे की जा सकती है और किन संकेतों से नकली सामग्री की पहचान संभव है।
कानूनी पहलुओं को भी विस्तार से शामिल किया गया है। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (IT Act), भारतीय दंड संहिता (IPC) की संबंधित धाराएँ, तथा बच्चों की सुरक्षा से जुड़े प्रावधानों की जानकारी दी गई है। साथ ही, यह भी बताया गया है कि शिकायत दर्ज कराने की प्रक्रिया क्या है, साइबर क्राइम पोर्टल का उपयोग कैसे करें, और शुरुआती 24 घंटों में कौन से कदम उठाने चाहिए। यह भाग पुस्तक को केवल भावनात्मक कथा से आगे बढ़ाकर एक उपयोगी मार्गदर्शिका बना देता है।
पुस्तक का एक महत्वपूर्ण पक्ष समाधान-केंद्रित दृष्टिकोण है। लेखक यह स्पष्ट करते हैं कि समस्या का समाधान केवल कानून से नहीं, बल्कि सामूहिक जागरूकता से संभव है। ग्राम पंचायत स्तर पर डिजिटल सुरक्षा समिति, स्कूलों में साइबर नैतिकता की शिक्षा, अभिभावकों के लिए डिजिटल साक्षरता कार्यक्रम, और समुदाय आधारित जागरूकता अभियान—ये सब पुस्तक में सुझाए गए व्यावहारिक उपाय हैं।
इसके अतिरिक्त, लेखक परिवार की भूमिका पर विशेष बल देते हैं। वे बताते हैं कि किसी भी ऐसी घटना में सबसे पहले पीड़ित को समर्थन और विश्वास की आवश्यकता होती है। यदि परिवार समझदारी, संवेदनशीलता और साहस दिखाए, तो स्थिति को संभालना संभव है। पीड़ित को दोषी ठहराने के बजाय उसके साथ खड़ा होना ही वास्तविक समाधान की शुरुआत है।
पुस्तक यह भी प्रश्न उठाती है कि क्या हमारी सामाजिक सोच तकनीक की गति के साथ विकसित हो रही है? जब डिजिटल दुनिया सीमाएँ तोड़ चुकी है, तो क्या हमारी नैतिकता, जिम्मेदारी और कानून भी उतनी ही तेजी से विकसित हो रहे हैं? लेखक समाज से आत्ममंथन की अपेक्षा करते हैं—क्या हम पीड़ितों के लिए सुरक्षित वातावरण बना पा रहे हैं, या अब भी चुप्पी और बदनामी के डर को प्राथमिकता दे रहे हैं?
“डिजिटल दाग़” अंततः निराशा की कहानी नहीं है। यह संघर्ष, जागरूकता और पुनर्निर्माण की कहानी भी है। यह दिखाती है कि जब कुछ लोग साहस दिखाते हैं—चाहे वह एक शिक्षक हो, एक सामाजिक कार्यकर्ता हो, या परिवार का सदस्य—तो बदलाव संभव है। तकनीक स्वयं दोषी नहीं; उसका दुरुपयोग ही समस्या है। इसलिए समाधान भी तकनीक के साथ जिम्मेदारी, शिक्षा और संवेदनशीलता को जोड़ने में निहित है।
यह पुस्तक शिक्षकों, अभिभावकों, छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, नीति-निर्माताओं और डिजिटल युग में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह कहानी दिल को छूती है, सोच को झकझोरती है और समाज को आईना दिखाती है।
“डिजिटल दाग़” एक चेतावनी भी है और एक आह्वान भी—
कि डिजिटल दुनिया में फैलने वाला एक झूठ, किसी की पूरी ज़िंदगी पर स्थायी दाग़ न बन जाए।
और यह भी कि यदि हम समय रहते जाग जाएँ, तो हर दाग़ को मिटाने की शुरुआत संभव है।
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