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एक विखण्डित चेतना का मोज़ेक

Raj K Mishra
Type: Print Book
Genre: Philosophy
Language: Hindi
Price: ₹371 + shipping
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Description

यह पुस्तक किसी एक ‘विचार’ में बंधने से इंकार करती है। यह न उपन्यास है, न दर्शन-ग्रंथ, न विज्ञान-कथा—बल्कि इन सबके बीच बहती मानव चेतना की एक आवेग-धार है।

मिथक, धर्म, विज्ञान, नैतिकता, भाषा, प्रेम, सामाजिक विघटन और भविष्य की संभावनाओं के माध्यम से यह रचना उस मूल प्रश्न को टटोलती है—मनुष्य आखिर क्यों जीता है, और वही अर्थ बोध क्यों बन जाता है।

यहाँ कथा साधन नहीं, साध्य है। ‘देवता, अवतार और दिव्य सत्य नहीं, बल्कि भय और असुरक्षा में गुँथने की मानवीय मनःस्थितियाँ हैं।’
विज्ञान भी यहाँ अंतिम उत्तर नहीं, बल्कि एक वैचारिक उपकरण के रूप में उपस्थित है।

पुस्तक न समाधान देती है, न व्यवस्था—यह पाठक को असहज करती है, क्योंकि वह दिखाती है कि मनुष्य कभी पूरी तरह तर्कसंगत या पूरी तरह पागल नहीं होता; वह बस अर्थ की तलाश में चलता हुआ एक यात्री है।

यह कृति उन पाठकों के लिए है, जो कहानी से अधिक चेतना, और उत्तरों से अधिक प्रश्नों में जीते हैं।

About the Author

राज के मिश्र उन लेखकों में हैं जो साहित्य को चेतना की परीक्षा मानते हैं। उनका लेखन मनोविज्ञान, दर्शन और सौंदर्यशास्त्र का संगम है। वे प्रेम, ईश्वर, अवसाद और मानवीय अपूर्णता को क्लिनिकल ईमानदारी तथा काव्यात्मक भाषा में उद्घाटित करते हैं।
“एक विखंडित चेतना का मोज़ेक” उनकी दूसरी कृति है। उनकी प्रथम कृति “भगोड़े का सिंहासन: मनोदर्शनात्मक गद्य एवं लघुकथाएँ” है। लेखक झारखण्ड सरकार में कार्यरत हैं।

लेखक से ईमेल के माध्यम से raj.k.mishra.rm@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

Book Details

ISBN: 9789373352206
Number of Pages: 328
Dimensions: 5.83"x8.27"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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