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यह पुस्तक किसी एक ‘विचार’ में बंधने से इंकार करती है। यह न उपन्यास है, न दर्शन-ग्रंथ, न विज्ञान-कथा—बल्कि इन सबके बीच बहती मानव चेतना की एक आवेग-धार है।
मिथक, धर्म, विज्ञान, नैतिकता, भाषा, प्रेम, सामाजिक विघटन और भविष्य की संभावनाओं के माध्यम से यह रचना उस मूल प्रश्न को टटोलती है—मनुष्य आखिर क्यों जीता है, और वही अर्थ बोध क्यों बन जाता है।
यहाँ कथा साधन नहीं, साध्य है। ‘देवता, अवतार और दिव्य सत्य नहीं, बल्कि भय और असुरक्षा में गुँथने की मानवीय मनःस्थितियाँ हैं।’
विज्ञान भी यहाँ अंतिम उत्तर नहीं, बल्कि एक वैचारिक उपकरण के रूप में उपस्थित है।
पुस्तक न समाधान देती है, न व्यवस्था—यह पाठक को असहज करती है, क्योंकि वह दिखाती है कि मनुष्य कभी पूरी तरह तर्कसंगत या पूरी तरह पागल नहीं होता; वह बस अर्थ की तलाश में चलता हुआ एक यात्री है।
यह कृति उन पाठकों के लिए है, जो कहानी से अधिक चेतना, और उत्तरों से अधिक प्रश्नों में जीते हैं।
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