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पटना की एक संकरी गली में, एक छोटे से कमरे की आधी खुली खिड़की के पास बैठा अनिरुद्ध अपने जीवन को धीरे-धीरे सुलझा रहा है। दीवार के पार किसी घटना की कथा नहीं है, बल्कि ठहराव, प्रतीक्षा और रुकने की कहानी है। यह उस युवक की कहानी है जो न पूरी तरह बाहर होता है, न पूरी तरह भीतर—बस बीच में। एक कमरे की चुप्पी, माँ के छोटे वाक्य, पिता की खाँसी, और शहर की आवाज़ें—सब मिलकर एक ऐसा संसार रचते हैं जो न पूरी तरह बदलता है, न पूरी तरह वैसा रहता है। यह उपन्यास बड़े फैसलों या नाटकीय मोड़ों पर नहीं टिकता। यहाँ जीवन छोटे-छोटे वाक्यों में आगे बढ़ता है—"उठ गया?", "चाय रख दी", "अब तुझे समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।" इन्हीं पंक्तियों के बीच अनिरुद्ध अपने होने को समझता है। दीवार के पार उन पाठकों के लिए है जो तेज़ कहानियों से थक चुके हैं और गहरे अनुभव की तलाश में हैं; जो शब्दों के बीच की ख़ामोशी में खुद को पाना चाहते हैं।
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