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पूछते हो सैयद कौन है?
यह किताब किसी नाम की पहचान नहीं है, बल्कि एक ऐसे सवाल की गूँज है जो हर इंसान के भीतर कभी न कभी जन्म लेता है। “पूछते हो सैयद कौन है?” आज़ाद नज़्मों का वह संग्रह है जहाँ शब्द गिने नहीं जाते, महसूस किए जाते हैं। इन नज़्मों में फ़ुरक़त की ख़ामोशी है, शिकवे की तल्ख़ी है, बाज़ार की बेरुख़ी है और ज़िंदगी से डरते हुए भी मुस्कुराने की ज़िद मौजूद है। यह किताब उन लम्हों की गवाही देती है जहाँ इंसान ज़िंदा रहते हुए अपने जनाज़े कंधों पर उठाता है और फिर उसी थकान के साथ ख़ुद से सवाल करता है—मैं कौन हूँ? अगर कभी आपने भीड़ में खड़े होकर अपनी ही पहचान खो दी हो, तो यह किताब आपसे ही मुख़ातिब है, क्योंकि सवाल आज भी वही है—पूछते हो सैयद कौन है?
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