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जूते और जमाना: एक खामोश गवाह, एक अनकहा सच
"दुनिया अक्सर पैरों की धूल देखती है, लेकिन उन पैरों के नीचे दबे 'साथी' की सिसकियाँ नहीं सुनती।"
यह कहानी किसी इंसान ने नहीं लिखी, बल्कि इसे जीया है उस चमड़े के एक टुकड़े ने, जिसे एक कारखाने की भट्टी में तपाकर 'जूते' का आकार दिया गया था। वह शोरूम के ठंडे काँच के पीछे से गुज़रते हज़ारों चेहरों को देखता था, लेकिन उसे इंतज़ार था एक ऐसे 'राही' का, जिसके इरादे चट्टान की तरह मज़बूत हों।
तभी उसकी मुलाकात होती है उस नौजवान से, जिसकी जेब खाली थी पर आँखों में मंज़िलों के ख्वाब थे। यह किताब सुमित... नहीं, बल्कि उस गुमनाम संघर्षी की दास्तान है, जिसका मज़ाक ज़माने ने उसके फटे झोले और टूटी चप्पलों को देखकर उड़ाया था।
इस रहस्यमयी सफर में आप जानेंगे:
फर्श से अर्श तक: कारखाने की धूल से लेकर मुशायरे के आलीशान मंच तक का वो सफर, जहाँ पसीना और स्याही एक हो जाते हैं।
अदृश्य वफादारी: जब दुनिया काबिलियत से पहले कपड़ों की चमक देखती थी, तब उस 'खास ब्रांड' के जूते ने उसके गिरते आत्मविश्वास को थामे रखा।
पहचान का संकट: क्या सफलता के शिखर पर पहुँचकर वह युवा शायर अपने उस 'पुराने साथी' को भूल जाएगा, जिसने तपती सड़कों पर खुद घिसकर उसके पैरों के छालों को बचाया था?
लेखक सक्षम मिश्रा की यह मर्मस्पर्शी कृति आपको अहसास कराएगी कि असली कीमत जूतों के 'ब्रांड' की नहीं, बल्कि उस 'वफादारी' की होती है जिसका कोई मोल नहीं लगाया जा सकता।
"एक ऐसा साथी, जो बोल नहीं सकता... पर जिसके बिना सफलता की कहानी अधूरी है।"
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