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यह किताब उत्तर नहीं देती — यह देखने की दृष्टि देती है।
“मैं कौन हूँ?”
यह सवाल किसी किताब से नहीं,
बल्कि उस पल से पैदा होता है
जब सब शांत होता है
और भीतर कुछ पूछने लगता है।
यह पुस्तक जीवन, मृत्यु, आत्मा और चेतना पर
कोई उपदेश नहीं देती,
न ही किसी विचारधारा को थोपती है।
इसमें विज्ञान है,
उपनिषदों की सरल झलक है,
और सबसे ज़्यादा —
एक ईमानदार खोज।
यह किताब उनके लिए है
जो जवाबों से संतुष्ट नहीं होते,
जो डर से नहीं बल्कि समझ से जीना चाहते हैं।
अगर आप रात के सन्नाटे में
कभी यह महसूस कर चुके हैं कि
“यह जीवन सिर्फ़ इतना ही नहीं हो सकता”,
तो यह किताब
आपके लिए है।
यह पुस्तक आपको बदलने नहीं आई —
यह आपको सुनने आई है।
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