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“शबनमी मंज़र” एक ऐसी नज़्म-संग्रह है जो इंसानी एहसासात, रूहानियत, क़ुदरत और ज़िंदगी के बदलते रंगों को नर्म लफ़्ज़ों में समेटता है। उर्दू नज़्मों का यह मजमुआ कभी दर्द की हल्की चुभन बनकर उभरता है, कभी मोहब्बत की नरमी, कभी समाज की सच्चाइयों का आईना, और कभी क़ुदरत के शफ़्फ़ाफ़ मनाज़िर की तरह दिल पर उतरता है।
इस किताब में फ़रेबी दुनिया से लेकर मुहब्बत, कश्मीर, मज़दूर, वजूद, इल्म और शबनमी मंज़र तक—हर नज़्म अपने भीतर एक अलग दुनिया, एक अलग तासीर लिए हुए है। ज़िंदगी के छोटे-बड़े लम्हों, रिश्तों, जज़्बातों और तजुर्बों को शायर ने कभी सादगी से, कभी गहराई से, और कभी रूहानी रंगों में ढालकर पेश किया है।
नस्री नज़्म की आज़ाद रवानी और रिवायती शायरी की नफ़ासत—दोनों का मेल इस किताब को एक ख़ास पहचान देता है। यह मजमुआ उन तमाम क़ारिईन के लिए है जो लफ़्ज़ों में छुपे एहसास को महसूस करना चाहते हैं, और शायरी को सिर्फ़ पढ़ना नहीं, जीना चाहते हैं।
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