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तप्पा : परंपरा, दिखावा और समाज का आत्ममंथन

श्राद्धकर्म, महाभोज और मानवीय संवेदना पर एक विचारात्मक अध्ययन
Sir Krishna
Type: Print Book
Genre: Social Science, Philosophy
Language: Hindi
Price: ₹215 + shipping
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Description

तप्पा
परंपरा, दिखावा और समाज का आत्ममंथन

यह पुस्तक किसी परंपरा के पक्ष या विरोध में लिखी गई रचना नहीं है, बल्कि उन प्रश्नों का दस्तावेज़ है जो समय के साथ हमारे समाज में स्वाभाविक रूप से जन्म लेते हैं।
“तप्पा” — जो मूलतः श्राद्धकर्म से जुड़ी एक सामाजिक परंपरा रही है — आज कई स्थानों पर श्रद्धा से आगे बढ़कर प्रतिष्ठा, दबाव और सामर्थ्य के प्रदर्शन का माध्यम बनती दिखाई देती है।

लेखक इस पुस्तक में तप्पा और श्राद्धकर्म से जुड़े सामाजिक व्यवहारों, मानसिकताओं और मौन अपेक्षाओं का संवेदनशील विश्लेषण करता है।
यह पुस्तक यह समझने का प्रयास करती है कि कैसे श्रद्धा धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलती है, और कैसे समाज कई बार अनजाने में साधारण व्यक्ति को उसकी सामर्थ्य से आगे धकेल देता है।

भीड़, भोजन, दिखावा, सामाजिक दबाव, और मानवीय संवेदना — इन सभी पहलुओं को यह पुस्तक शांत भाषा में सामने रखती है।
यह न तो आरोप लगाती है, न ही निर्णय सुनाती है, बल्कि पाठक को स्वयं सोचने के लिए आमंत्रित करती है।

‘तप्पा’ एक विचारात्मक अध्ययन है, जो यह प्रश्न छोड़ जाती है—
क्या हमारी परंपराएँ आज भी मानवीय संवेदना के साथ चल रही हैं, या वे केवल सामाजिक स्वीकृति का साधन बनती जा रही हैं?

यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो परंपराओं को आँख बंद कर अपनाने के बजाय, उन्हें समझना और संतुलित दृष्टि से देखना चाहते हैं।

About the Author

सर कृष्णा एक संवेदनशील लेखक और सामाजिक विषयों के विचारशील अध्येता हैं।
उनकी लेखनी का केंद्र भारतीय समाज, उसकी परंपराएँ, और समय के साथ बदलती सामाजिक मानसिकताएँ रही हैं।
वे उन विषयों पर लिखते हैं, जिन पर अक्सर चर्चा तो होती है, पर गहराई से सोचने का साहस कम लोग करते हैं।

लेखक का मानना है कि परंपराएँ समाज की पहचान होती हैं, पर वे विवेक और मानवीय संवेदना से जुड़ी रहें, तभी सार्थक बनती हैं।
उनकी रचनाएँ किसी निष्कर्ष को थोपने के बजाय प्रश्न उठाती हैं—
ऐसे प्रश्न, जो पाठक को ठहरकर सोचने के लिए प्रेरित करते हैं।

“तप्पा” लेखक की विचारधारा का प्रतिनिधि कार्य है, जिसमें वे श्राद्धकर्म, सामाजिक प्रतिष्ठा, दिखावा और मानवीय संवेदना जैसे विषयों को शांत, संतुलित और जिम्मेदार भाषा में प्रस्तुत करते हैं।
यह पुस्तक आलोचना नहीं, बल्कि आत्ममंथन का आमंत्रण है—
जहाँ समाज को स्वयं से संवाद करने का अवसर मिलता है।

लेखक का उद्देश्य लेखन के माध्यम से समाज को बाँटना नहीं, बल्कि समझ बढ़ाना है।
उनकी दृष्टि में साहित्य का सबसे बड़ा धर्म यही है कि वह मनुष्य को अधिक संवेदनशील और जिम्मेदार बनाए।

Book Details

ISBN: 9789356556058
Publisher: Self-Published
Number of Pages: 92
Dimensions: 5.83"x8.27"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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