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तप्पा
परंपरा, दिखावा और समाज का आत्ममंथन
यह पुस्तक किसी परंपरा के पक्ष या विरोध में लिखी गई रचना नहीं है, बल्कि उन प्रश्नों का दस्तावेज़ है जो समय के साथ हमारे समाज में स्वाभाविक रूप से जन्म लेते हैं।
“तप्पा” — जो मूलतः श्राद्धकर्म से जुड़ी एक सामाजिक परंपरा रही है — आज कई स्थानों पर श्रद्धा से आगे बढ़कर प्रतिष्ठा, दबाव और सामर्थ्य के प्रदर्शन का माध्यम बनती दिखाई देती है।
लेखक इस पुस्तक में तप्पा और श्राद्धकर्म से जुड़े सामाजिक व्यवहारों, मानसिकताओं और मौन अपेक्षाओं का संवेदनशील विश्लेषण करता है।
यह पुस्तक यह समझने का प्रयास करती है कि कैसे श्रद्धा धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलती है, और कैसे समाज कई बार अनजाने में साधारण व्यक्ति को उसकी सामर्थ्य से आगे धकेल देता है।
भीड़, भोजन, दिखावा, सामाजिक दबाव, और मानवीय संवेदना — इन सभी पहलुओं को यह पुस्तक शांत भाषा में सामने रखती है।
यह न तो आरोप लगाती है, न ही निर्णय सुनाती है, बल्कि पाठक को स्वयं सोचने के लिए आमंत्रित करती है।
‘तप्पा’ एक विचारात्मक अध्ययन है, जो यह प्रश्न छोड़ जाती है—
क्या हमारी परंपराएँ आज भी मानवीय संवेदना के साथ चल रही हैं, या वे केवल सामाजिक स्वीकृति का साधन बनती जा रही हैं?
यह पुस्तक उन पाठकों के लिए है जो परंपराओं को आँख बंद कर अपनाने के बजाय, उन्हें समझना और संतुलित दृष्टि से देखना चाहते हैं।
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