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यह किताब कोई कहानी नहीं है, बल्कि उस कड़वे सच की गूँज है जिसे हम रोज़ अपनी आँखों से देखते हैं लेकिन चुपचाप सह जाते हैं। हमने शिक्षा को बाज़ार बना दिया, रिश्तों को स्क्रीन में कैद कर लिया, और अपनी आज़ादी को 'ईएमआई' के नाम पर बैंक के पास गिरवी रख दिया है
अक्सर हम कहते हैं कि 'सिस्टम खराब है', लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि समाज का आईना सरकार नहीं, हम खुद हैं। अगर चेहरा गंदा हो, तो आईना बदलने से कुछ नहीं होता। इस किताब के माध्यम से मैंने कोशिश की है कि हम उन दागों को देख सकें जो हमारे संस्कारों और हमारी जड़ों को दीमक की तरह खा रहे हैं।
"हम रोज़ ये बात करते हैं कि सरकार कुछ नहीं करती, पर आपने क्या किया? जब आपको कुछ करने का मौका मिलता है, तब आप उसमें कमी निकालते हैं। अगर मैं आपसे कहूँ कि आप मेरे साथ मिलकर एक पहल शुरू करें, तब क्या आप मेरा साथ दोगे?
आज समाज में अपराध इसीलिए है क्योंकि इस समाज ने 'टोकना' छोड़ दिया है और आज हम अपने संस्कार भूल चुके हैं। मैंने अपनी किताब 'समाज का आईना' में 2 मॉडल दिए हैं— 'पंच समिति' और 'नगर संसद'।
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