You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
क्या आपने कभी महसूस किया है कि आप वही बनते जा रहे हैं…
जिससे बचना चाहते थे?
“दर्पण” एक ऐसी कहानी है, जो बाहर नहीं — भीतर घटती है।
काव्या की ज़िंदगी बदलती है एक छोटे से पल से —
एक drawing, जिसे उसने पहले कभी सच में देखा ही नहीं।
उस एक नज़र से खुलता है एक दरवाज़ा —
तीन पीढ़ियों तक फैली एक ऐसी विरासत की ओर,
जिसे कभी शब्दों में नहीं कहा गया…
बस चुपचाप जिया गया।
यह कहानी है:
उन पैटर्न्स की, जो हमें विरासत में मिलते हैं
उन ज़ख्मों की, जिन्हें हम समझे बिना दोहराते हैं
और उस एक फैसले की —
जो इस चक्र को यहीं रोक सकता है
क्या हम सच में अपने अतीत से अलग हो सकते हैं?
या हम हमेशा उसी का प्रतिबिंब रह जाते हैं?
“दर्पण” जवाब नहीं देता।
यह आपको आपके भीतर ले जाता है।
और शायद — पहली बार —
आप खुद को सच में देख पाएँगे।
कुछ विरासतें मिलती नहीं…
छूटती हैं।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book दर्पण.