You can access the distribution details by navigating to My Print Books(POD) > Distribution
जीना चाहता हूँ
कभी-कभी ज़िंदगी से हमें कोई बड़ी शिकायत नहीं होती, बस मन के भीतर एक छोटी-सी आवाज़ उठती है—
मैं सच में जीना चाहता हूँ।
यह किताब उन्हीं अनकहे सवालों, अधूरी भावनाओं, रिश्तों, यादों, उम्मीदों और उन संघर्षों की कहानी है, जिन्हें हम अक्सर अपने भीतर ही दबाकर आगे बढ़ते रहते हैं।
जीना चाहता हूँ ज़िंदगी को किसी नियम या सूत्र में बाँधने की कोशिश नहीं करती। यह बस उन पलों के साथ बैठती है, जहाँ हम खुद से सवाल करते हैं—मैं क्या चाहता हूँ? मैं किसके लिए जी रहा हूँ? क्या हर चीज़ को पाने की कोशिश में मैंने जीना तो नहीं छोड़ दिया?
कभी एक कमरे की खामोशी में, कभी समुद्र की लहरों में, कभी किसी पुराने रिश्ते की याद में और कभी किसी अपने के साथ बिताए छोटे-से पल में—ज़िंदगी हमें बार-बार समझाती है कि खुश रहने के लिए हमेशा बहुत कुछ होना ज़रूरी नहीं होता।
यह किताब उन लोगों के लिए है जिन्होंने कभी किसी को खोया है, किसी का इंतज़ार किया है, किसी रिश्ते को बचाने की कोशिश की है, खुद को दूसरों की उम्मीदों में तलाशा है या भीड़ के बीच खड़े होकर भी अकेलापन महसूस किया है।
एक कंप्यूटर साइंस के शिक्षक और लेखक के दृष्टिकोण से लिखी गई यह किताब कोड और ज़िंदगी के बीच एक अनोखा रिश्ता तलाशती है—जहाँ कुछ समस्याओं का समाधान मिल जाता है, कुछ का नहीं; कुछ चीज़ें दोबारा लिखी जा सकती हैं, लेकिन कुछ यादें हमेशा के लिए हमारी कहानी का हिस्सा बन जाती हैं।
शायद ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत हिस्सा यह नहीं कि सब कुछ हमारे मन के अनुसार हो जाए, बल्कि यह है कि हम अपूर्णताओं के साथ भी आगे बढ़ना सीखें।
क्योंकि ज़िंदगी हमेशा आसान होने का वादा नहीं करती।
लेकिन शायद वह हमें एक और मौका ज़रूर देती है—
खुद को समझने का, कुछ छोड़ देने का, किसी को अपनाने का और फिर से कहने का…
हाँ, मैं जीना चाहता हूँ।
Currently there are no reviews available for this book.
Be the first one to write a review for the book जीना चाहता हूँ.