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यात्रा समाप्त हुए कई वर्ष बीत चुके थे, फिर भी न जाने क्यों उसके कुछ दृश्य बारंबार मानस पटल पर उभर आते थे। कभी भोर के अँधेरे में जंगल की ओर बढ़ता काफिला, कभी जेटी पर समुद्र के शांत होने की प्रतीक्षा, कभी पुराने खंडहरों का सन्नाटा और कभी नील द्वीप की वह संध्या, जब सूर्यास्त देखकर लौटते हुए हम गलत पगडंडी पकड़कर जंगल में भटक गए थे।
सन् २०१६ की यह यात्रा गोरखपुर से चेन्नई और महाबलीपुरम होते हुए अंडमान पहुँची। पोर्ट ब्लेयर से आगे रॉस द्वीप, नॉर्थ बे, बाराटांग, जॉली बॉय, हैवलॉक, नील और चिड़िया टापू तक एक के बाद एक पड़ाव जुड़ते चले गए। यात्रा की रूपरेखा तो पहले से तैयार थी, पर रास्ते में क्या मिलेगा और कौन सा दिन किस रूप में सामने आएगा, यह यात्रा विवरणिका में कहाँ लिखा जा सकता था।
‘द्वीप-द्वीप अंडमान’ उन्हीं दिनों की कथा है। जैसा देखा, जैसा अनुभव किया और जितना स्मृतियों में बचा रहा, उसे उसी रूप में सहेजने का एक प्रयास।
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