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इंद्रधनुष
ब्रह्मांड, ईश्वर, नैतिकता और मनुष्य: सत्य की खोज से जीवन के अर्थ तक
ब्रह्मांड कहाँ से आया? मनुष्य की उत्पत्ति कैसे हुई? क्या नैतिकता के लिए ईश्वर में विश्वास आवश्यक है? मृत्यु के बाद जीवन का अर्थ क्या है? और यदि जीवन का कोई पूर्वनिर्धारित उद्देश्य नहीं है, तो हम अपने जीवन को सार्थक कैसे बनाएँ?
इंद्रधनुष ऐसे ही बुनियादी सवालों की एक विचारोत्तेजक यात्रा है, जो आधुनिक विज्ञान, भारतीय दर्शन और तर्कशील चिंतन को एक साथ लाती है।
इस पुस्तक में लेखक ब्रह्मांड की उत्पत्ति, विकासवाद, धर्म और देवताओं की उत्पत्ति, नैतिकता के विकास, सत्य की कसौटी, मृत्यु तथा जीवन के अर्थ जैसे विषयों की पड़ताल करते हैं। ऋग्वेद के नासदीय सूक्त, बुद्ध, महावीर, चार्वाक, कबीर और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधाराओं के साथ आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण का संवाद इस यात्रा को भारतीय संदर्भ प्रदान करता है।
यह पुस्तक न तो आस्था का उपहास करती है और न ही परंपरा को बिना प्रश्न स्वीकार करने का आग्रह। इसका उद्देश्य पाठक को अपनी मान्यताओं पर विचार करने, प्रमाण और कल्पना में अंतर समझने तथा असुविधाजनक प्रश्नों का सामना करने के लिए प्रेरित करना है।
सात अध्यायों में आगे बढ़ती यह यात्रा अंततः एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न पर पहुँचती है—यदि जीवन का अर्थ हमें पहले से तैयार नहीं मिला, तो उसे गढ़ने की स्वतंत्रता और जिम्मेदारी हमारी कितनी है?
इंद्रधनुष उन पाठकों के लिए है जो विज्ञान, दर्शन, धर्म, मानवता और जीवन के उद्देश्य को भारतीय दृष्टिकोण से समझना चाहते हैं और जो तैयार उत्तरों से अधिक स्वतंत्र चिंतन को महत्त्व देते हैं।
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