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हिंदू धर्म में तर्क बनाम आस्था

अनूप पचौरी
Type: Print Book
Genre: Religion & Spirituality
Language: Hindi
Price: ₹300 + shipping
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Description

हिंदू धर्म में तर्क बनाम आस्था
एक तटस्थ बौद्धिक विमर्श

एक मृत नवजात। एक पंडित के शब्द: "पूर्वजन्म के पापों का फल है।" और एक प्रश्न, जो उस रात जन्मा और फिर कभी शांत नहीं हुआ।

यह पुस्तक उस प्रश्न की यात्रा है — गंगाजल से नहाए, रामायण की चौपाइयाँ सुनकर बड़े हुए, मंदिर में माथा टेकने वाले एक हिंदू की यात्रा, जिसने आँखें मूंदकर नहीं, बल्कि आँखें खोलकर अपनी परंपरा को देखने का साहस किया।

अनूप पचौरी सात अध्यायों में उन प्रश्नों का सामना करते हैं जिन्हें अक्सर पूछना ही पाप मान लिया जाता है — जाति व्यवस्था, स्त्री और अशुद्धता का मिथक, कर्म सिद्धांत की कमज़ोरियाँ, अवतारवाद के विरोधाभास, और सती जैसी कुप्रथाओं की ऐतिहासिक गवाही। रामायण, महाभारत और गीता की सूक्ष्म विवेचना से लेकर विज्ञान और शास्त्र के टकराव तक, यह पुस्तक हर असुविधाजनक कोने में तर्क का दीपक लेकर जाती है।

पर यह धर्म पर आघात नहीं है — यह प्रेम-पत्र है। बुद्ध के कालाम सुत्त से लेकर अंबेडकर के साहस तक, ऋग्वेद के "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" से लेकर उपनिषद के "असतो मा सद्गमय" तक — लेखक भारतीय चिंतन-परंपरा की उसी उदार आत्मा से प्रेरणा लेते हैं जिस पर वे प्रश्न उठाते हैं।

यह पुस्तक उस हर व्यक्ति के लिए है जिसने कभी रात के सन्नाटे में पूछा है — "क्यों?" — और जिसे मौन के अलावा कोई उत्तर नहीं मिला।

"जब पुस्तक बंद होती है, यात्रा शुरू होती है।"
— अनूप पचौरी

About the Author

यह रहा **लेखक परिचय** — बैक कवर या पुस्तक के भीतरी पृष्ठ पर उपयोग हेतु:

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**लेखक परिचय**

अनूप पचौरी एक स्वतंत्र विचारक, लेखक और सामाजिक विश्लेषक हैं, जिनकी दृष्टि धर्म, समाज, विज्ञान और मानवीय गरिमा के अंतर-संबंधों पर गहन अध्ययन और लेखन में सन्निहित है। न तो पूर्णतः नास्तिक, न ही परंपरा के अंधभक्त — वे उस विरल बौद्धिक धारा के प्रतिनिधि हैं जो भारतीय दर्शन की श्रेष्ठता को स्वीकार करते हुए भी उसमें घुस आई जड़ता और अन्याय पर प्रश्न उठाने का साहस रखती है। यह वही परंपरा है जिसमें राजा राम मोहन राय, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फुले, स्वामी विवेकानंद और डॉ. अंबेडकर जैसे विचारक खड़े दिखते हैं — जिन्होंने अपनी ही सभ्यता के भीतर से सुधार की माँग उठाई।

एक ऐसे परिवार में जन्मे और पले-बढ़े जहाँ परंपरा और आस्था जीवन के केंद्र में थी, पचौरी जी की बौद्धिक यात्रा एक सरल-से प्रश्न से आरंभ हुई — "क्यों?" इसी एक शब्द ने उन्हें वेदों, उपनिषदों, महाभारत और रामायण के गहन पाठ से लेकर अंबेडकर, बुद्ध, रसेल और कार्ल सागान तक की वैचारिक यात्रा पर ले गया।

प्रबंधन, दर्शनशास्त्र और विज्ञान — तीनों क्षेत्रों में उनकी विधिवत शिक्षा (MBA, M.Phil., M.Sc., M.A.) उन्हें एक दुर्लभ क्षमता प्रदान करती है: जटिल और बहु-आयामी विषयों को तार्किक स्पष्टता तथा मानवीय गर्मजोशी के साथ प्रस्तुत करने की क्षमता। उनकी लेखनी की सबसे बड़ी विशेषता है — कठोर प्रश्न पूछने की निर्भीकता, और साथ-साथ उस परंपरा के प्रति गहरी करुणा जिस पर वे प्रश्न उठाते हैं।

पचौरी जी इस पुस्तक को हिंदू धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि उसकी मूल आत्मा के पक्ष में लिखा गया एक प्रेम-पत्र मानते हैं।

**"जब पुस्तक बंद होती है, यात्रा शुरू होती है।"**

Book Details

Publisher: Independently published
Number of Pages: 142
Dimensions: 5.82"x8.28"
Interior Pages: B&W
Binding: Paperback (Perfect Binding)
Availability: In Stock (Print on Demand)

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