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हिंदू धर्म में तर्क बनाम आस्था
एक तटस्थ बौद्धिक विमर्श
एक मृत नवजात। एक पंडित के शब्द: "पूर्वजन्म के पापों का फल है।" और एक प्रश्न, जो उस रात जन्मा और फिर कभी शांत नहीं हुआ।
यह पुस्तक उस प्रश्न की यात्रा है — गंगाजल से नहाए, रामायण की चौपाइयाँ सुनकर बड़े हुए, मंदिर में माथा टेकने वाले एक हिंदू की यात्रा, जिसने आँखें मूंदकर नहीं, बल्कि आँखें खोलकर अपनी परंपरा को देखने का साहस किया।
अनूप पचौरी सात अध्यायों में उन प्रश्नों का सामना करते हैं जिन्हें अक्सर पूछना ही पाप मान लिया जाता है — जाति व्यवस्था, स्त्री और अशुद्धता का मिथक, कर्म सिद्धांत की कमज़ोरियाँ, अवतारवाद के विरोधाभास, और सती जैसी कुप्रथाओं की ऐतिहासिक गवाही। रामायण, महाभारत और गीता की सूक्ष्म विवेचना से लेकर विज्ञान और शास्त्र के टकराव तक, यह पुस्तक हर असुविधाजनक कोने में तर्क का दीपक लेकर जाती है।
पर यह धर्म पर आघात नहीं है — यह प्रेम-पत्र है। बुद्ध के कालाम सुत्त से लेकर अंबेडकर के साहस तक, ऋग्वेद के "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः" से लेकर उपनिषद के "असतो मा सद्गमय" तक — लेखक भारतीय चिंतन-परंपरा की उसी उदार आत्मा से प्रेरणा लेते हैं जिस पर वे प्रश्न उठाते हैं।
यह पुस्तक उस हर व्यक्ति के लिए है जिसने कभी रात के सन्नाटे में पूछा है — "क्यों?" — और जिसे मौन के अलावा कोई उत्तर नहीं मिला।
"जब पुस्तक बंद होती है, यात्रा शुरू होती है।"
— अनूप पचौरी
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