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पुस्तक के बारे में
“भगवान के दलाल” किसी भगवान के अस्तित्व को साबित या खारिज करने वाली किताब नहीं है। यह किताब उस जगह पर सवाल उठाती है, जहाँ आस्था व्यक्तिगत विश्वास से निकलकर किसी दूसरे इंसान के अधिकार, डर और कारोबार का साधन बन जाती है। लेखक ने धर्म और आस्था को बाहर से देखकर नहीं, बल्कि उनके आसपास मौजूद मान्यताओं, परंपराओं और मानवीय व्यवहार को समझने की कोशिश करते हुए यह यात्रा लिखी है।
ज्योतिष, वास्तु, कर्मकांड, पूजा, मंत्र, दान, उपाय, ग्रह-दोष और धार्मिक व्यवस्थाएँ हमारी सामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी का हिस्सा रही हैं। बहुत से लोग इनमें विश्वास करते हैं और इन्हें मानसिक शांति, परंपरा या आध्यात्मिक सहारे के रूप में देखते हैं। किताब इन विश्वासों का मजाक नहीं उड़ाती। इसके बजाय यह एक जरूरी फर्क सामने रखती है—विश्वास और दावा एक बात नहीं हैं, परंपरा और डर एक बात नहीं हैं, और आस्था तथा उसका कारोबार भी एक बात नहीं हैं।
किताब उन परिस्थितियों को सामने लाती है जहाँ परेशान इंसान समाधान की तलाश में किसी ऐसे व्यक्ति पर निर्भर हो जाता है, जो खुद को भगवान, भाग्य, ग्रह, वास्तु या किसी अदृश्य शक्ति का जानकार बताता है। पहले समस्या को किसी दोष का नाम दिया जाता है, फिर डर पैदा होता है और अंत में उसी डर का समाधान बेच दिया जाता है। सवाल यहीं उठता है—क्या यह आस्था है, सलाह है या निर्भरता का कारोबार?
यह किताब आपको कोई अंतिम फैसला नहीं देती। यह आपको सवाल देती है—भगवान के नाम पर कही गई हर बात पर विश्वास करने से पहले क्या हमें यह पूछने का अधिकार नहीं कि “कैसे पता?”
शायद यही इस किताब का उद्देश्य है—विश्वास छीनना नहीं, विश्वास को आँखें खोलकर देखना।
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