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पंचवटी की उस एक घटना को सबने पढ़ा है। उसके पहले और बाद की मीनाक्षी को किसी ने नहीं जाना।
मीनाक्षी — महाकाव्य की विस्मृत नारी रावण की बहन की एक कल्पित, प्रथम-पुरुष आत्मकथा है। वह स्वयं को स्त्री, विदुषी, पत्नी, बहन और राक्षसी के रूप में पहचानती है—लेकिन इनमें से कोई भी पहचान उसकी पूरी कहानी नहीं कहती।
उपन्यास हमें स्वर्णमयी लंका के उस संसार में ले जाता है जहाँ मीनाक्षी का बचपन बीतता है। वहाँ उसका एक विद्वान पिता है, एक महत्वाकांक्षी भाई रावण है और एक सौम्य, स्नेहशील भाई कुम्भकर्ण है। इसी संसार में उसे विद्युज्जिह्वा मिलता है—एक ऐसा पुरुष जो उसकी बुद्धि को सुनता है, उसके विचारों का सम्मान करता है और उसे अपने स्वतंत्र अस्तित्व के साथ स्वीकार करता है।
लेकिन प्रेम और स्वतंत्रता का यह संसार राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा की भेंट चढ़ जाता है। पति की मृत्यु के बाद मीनाक्षी दण्डकारण्य में अपना जीवन नए सिरे से बनाती है। फिर एक दिन उसकी भेंट राम, सीता और लक्ष्मण से होती है। अग्नि के पास भोजन, विचारों का आदान-प्रदान और दो स्त्रियों के बीच जन्म लेती अप्रत्याशित समझ—इन सबके बीच वह घटना आकार लेती है जिसे परंपरा ने उसके पूरे जीवन की पहचान बना दिया।
पर क्या किसी स्त्री का संपूर्ण जीवन उसकी एक इच्छा, एक अपमान या एक घाव में समेटा जा सकता है?
यह उपन्यास रामायण का विरोध नहीं करता। यह उसके एक मौन की पड़ताल करता है। यहाँ रावण केवल खलनायक नहीं, बल्कि प्रेम करने वाला भाई और विनाशकारी सम्राट भी है। राम केवल आदर्श पुरुष नहीं, बल्कि अपने आदर्शों की सीमाओं से जूझते मनुष्य भी हैं। सीता केवल सहनशील पत्नी नहीं, बल्कि अपनी बुद्धि, विवेक और स्वतंत्र दृष्टि वाली स्त्री हैं। और मीनाक्षी केवल शूर्पणखा नहीं—वह एक ऐसा व्यक्तित्व है जिसकी कहानी महाकाव्य के बाद भी समाप्त नहीं होती।
नाम उसने रखा था। इतिहास ने उसे कुछ और बना दिया।
यदि आपने कभी सोचा है कि किसी महाकाव्य की कथा उस व्यक्ति की आँखों से कैसी दिखाई देती है, जिसके बारे में सबने लिखा, लेकिन जिसकी बात किसी ने नहीं सुनी, तो यह उपन्यास आपके लिए है।
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