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जिसके पास ऐसा दिल होगा वही लिख सकता है , टूट कर भी दर्पण से झूठ नहीं बोला जाता और बड़ी ईमानदारी से एक पंक्ति में शहर और गाँव को परिभाषित कर देते हैं यह लिख कर कि, एक व्यापारी शहर बेच गया मेरे गाँव में. भला इतनी मासूमियत से आज के बाजार वाद को कैसे लिखा जा सकता है. वाकई इसी कलम के लिए अनुज अनहद को युवा राष्ट्रीय युवा कवि और मैथिली शरण गुप्त युवा कवि पुरस्कार से सम्मानित किया गया है और साहित्य आज तक ने उन्हें माइक के लाल कार्यक्रम में अपने मंच पर स्थान प्रदान किया है.
वस्तुतः यह शब्द नहीं हैं , शब्दों की वैक्सीन हैं, जो इस पुस्तक में दूसरे और बूस्टर डोज के साथ मौजूद है. मेरा विश्वास है कि जिसने यह वैक्सीन अपने दिल में पहुँचने दी निश्चित रूप से वह वर्तमान समय के बाजारवादी वायरस का सामना बाख़ूबी कर लेगा, वह इंसानी रिश्तों में जज़बात की कद्र करने लगेगा और ख़ुद को किसी मशीन में ढल जाने से बचा लेगा.
वैसे मेरा मत है कि अनुज अनहद की यह लघु कविताएँ , पढ़ने वाले के हृदय में स्वतः प्रवेश कर जायेंगी क्योंकि वे लिखते हैं , दिल से दिल तक पहुंचाता हूँ, शब्दों से भावों की वैक्सीन बनाता हूँ.
यह अनुज अनहद जी की तीसरी पुस्तक है और वे अपनी पहली पुस्तक पुरानी कमींज के माध्यम से हिन्दी साहित्य जगत के दरवाज़े पर दस्तक दे चुके हैं. साहित्य आजतक ने उनकी यह दस्तक सुनी है, मुझे पूर्ण विश्वास है कि शब्दों की वैक्सीन पाठकों और समीक्षकों द्वारा सराही जाएगी.
आने वाले समय में अनुज अनहद अपने भीतर बसे गांव को ईमानदारी से जीवित रखते हुए इस महानगर की ज़िन्दगी को मशींन में ढल जाने के विरुद्ध जागरूकता पैदा करते हुए और भी विधा में सृजन करेंगे.
मैं अनुज अनहद को हृदय से शुभकामना देता हूँ और पुस्तक के सफलता की कामना करता हूँ.
इन्हीं शब्दों के साथ
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
(साहित्यकार)
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