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कभी-कभी लौटने में एक दिन नहीं—पूरी ज़िन्दगी लग जाती है।
एक आधी रात, दोस्तों की चुहल और अपनी निजी बेचैनी से बचता हुआ एक युवक शहर की उस गली में पहुँच जाता है, जिसके बारे में सभ्य दुनिया जानती तो सब कुछ है—पर स्वीकार कुछ नहीं करती।
लाल रोशनी के नीचे मीरा से हुई उसकी पहली मुलाकात सुबह होने से पहले समाप्त हो जानी चाहिए थी। लेकिन वह अपने पीछे एक संख्या—5—17, एक बंद लिफ़ाफ़ा, कुछ अधूरी चिट्ठियाँ और ऐसे प्रश्न छोड़ जाती है, जिनके उत्तर उसके जीवन की दिशा बदल देते हैं।
स्मृति, प्रेम, अपराधबोध और प्रतीक्षा से गुज़रती यह यात्रा वर्षों बाद समुद्र के किनारे एक खुले दरवाज़े तक पहुँचती है—जहाँ लौटना संभव तो है, लेकिन पहले जैसा होना नहीं। ‘तेरहवाँ दिन’ उन नामों, संबंधों और उम्मीदों की कहानी है, जो समय के साथ मिटते नहीं—केवल अपना रूप बदल लेते हैं।
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